Sidhitap me kua kriya hoti hai
शायद आप पूछना चाह रहे हैं: “Siddhi Tap / Siddhitap में कौन‑कौन सी क्रिया (vidhi) होती है?”
संक्षेप में, सामान्य रूप से प्रचलित सिद्धि तप / सिद्धितप की विधि इस प्रकार मानी जाती है (थोड़ा बहुत स्थान, परंपरा और गुरु‑परंपरा के अनुसार बदल सकता है):
1. समय‑अवधि
– साधारण रूप से इसे कई दिनों तक किया जाता है (बहुत कठोर तप माना जाता है)। – कई जगह यह लगभग 36 दिनों का विधान माना जाता है, पर कुछ स्थानों पर संख्या अलग भी हो सकती है।2. भोजन / उपवास की व्यवस्था
सिद्धि तप में मुख्य क्रिया उपवास और एकासना का क्रम है:- कुछ दिन –
- एक दिन पूर्ण उपवास (Upvās) – केवल उषःकालीन पानिय / उषःपान भी कई बार छोड़ दिया जाता है - अगले दिन एकासना (Ekāsan) – दिन में केवल एक बार सादा, मर्यादित भोजन - इस प्रकार उपवास – एकासना – उपवास – एकासना का क्रम चलता है।
- अन्त के 3–4 दिन –
- कई परंपराओं में अंत में अत्थम (3 दिन लगातार उपवास) या अत्थाई (4 दिन लगातार उपवास) रखा जाता है। - इन दिनों पानी भी बहुत मर्यादित या बिल्कुल नहीं (परंपरा पर निर्भर)।
3. आचार‑विहार की क्रिया
सिर्फ भूख सहना ही सिद्धि तप नहीं है; साथ‑साथ यह क्रियाएँ भी विशेष रूप से रखी जाती हैं:- प्रातःकालिक प्रतिक्रमण, सामायिक, स्वाध्याय
- नवकार मंत्र, सिद्धचक्र / नवपद की पूजा, स्तवन, पढ़ना‑सुनना
- क्रोध, मान, माया, लोभ आदि कषायों को अधिक से अधिक कम करना
- दिन भर अधिक बोलना, व्यर्थ बहस, मोबाइल‑टीवी आदि से बचना
- जीव‑दया, क्षमा‑भाव, मैत्री‑भाव बढ़ाने का विशेष प्रयास
4. उद्देश्य (क्यों किया जाता है?)
- कर्म क्षय (कर्मों को कम करना)
- आत्मा की शुद्धि, कषायों का क्षय
- मोक्ष‑मार्ग में प्रगति, सिद्ध पद की प्राप्ति की दिशा में आगे बढ़ना
- इसलिए इसे बहुत ऊँचा, कठिन और फलदायी तप माना जाता है।
5. परंपरा का अंतर
- दिगंबर और श्वेतांबर परंपराओं, और अलग‑अलग क्षेत्रों में,
यदि आप खुद सिद्धि तप करने की सोच रहे हों, तो किसी अनुभवी साधु / साध्वी / प्रवचनकार / ज्ञानी श्रावक के मार्गदर्शन में ही संकल्प लेना चाहिए।