आचारांग सूत्र जैन धर्म का है किंतु आप उसका उद्देश्यक 3 सूत्र 4 नहीं बता पा रहे हैंसूत्र
आचारांग सूत्र निश्चित ही जैन धर्म (आगम) का पहला आंग है। आप शायद यह कहना चाह रहे हैं कि – “आप आचारांग सूत्र के उद्देश्य को 3–4 सूत्रों (बिंदुओं) में क्यों नहीं बता पा रहे?”
मैं संक्षेप में, बहुत सरल भाषा में इसका उद्देश्य 3–4 मुख्य बिंदुओं में बता रहा हूँ:
- साधु का चरित्र व आचार बताना
- आचारांग सूत्र मुख्यतः मुनियों के लिये है। - किस तरह रहना, चलना, बोलना, सोचना – सबका विस्तार से नियम देता है।
- अहिंसा की चरम पराकाष्ठा सिखाना
- किसी भी जीव – सूक्ष्म से सूक्ष्म तक – को पीड़ा न पहुँचाने की शिक्षा। - चलने, बैठने, भोजन, व्यवहार – हर जगह अहिंसा का पालन कैसे हो, यह बताया है।
- इन्द्रियों और आसक्तियों पर नियंत्रण
- इन्द्रियों के विषयों (रूप, रस, गंध, स्पर्श, शब्द) से बचने की साधना। - कम से कम वस्तु में, बिना आसक्ति और लोभ के कैसे जीना – यह सिखाया है।
- संयम, तप और अन्तर्मुखी साधना का मार्ग
- संयम (व्रत), तप, क्षमा, विनय, शील आदि गुणों को विकसित करने के लिये नियम। - बाहर से नहीं, अपने भीतर को शुद्ध करने की साधना बताता है, जिससे मोक्ष मार्ग प्रशस्त हो।
यही आचारांग सूत्र का मूल उद्देश्य है – साधु‑जीवन का आदर्श स्वरूप, अहिंसा और संयम पर आधारित, और अंततः आत्मा की शुद्धि व मोक्ष की दिशा दिखाना।