आचारांग सूत्र उद्देश्यक 3 सूत्र 4 मूल रूप बताएं
आचारांग सूत्र प्रथम श्रुत‑स्कंध, प्रथम अध्ययन, तृतीय उद्देशक, सूत्र 4 (कई सम्पादनों में कुल क्रमांक 22)
मूल प्राकृत पाठ (देवनागरी में): लोकं च आणाए अभिसमेच्चा अकुतोभयं ॥
सरल अर्थ (अर्थ): जो साधु लोक (संसार / जीव‑अजीव की वास्तविकता) को ठीक प्रकार से पहचान‑समझ (सम्यक् ज्ञान) लेता है, वह “अकुतोभय” अवस्था को प्राप्त होता है — अर्थात ऐसा निर्भय हो जाता है कि उसे किसी से भी भय नहीं रहता।