पंचासतीकाय मे पाच द्रव्य और एक काल द्रव्य सारांश बताओ
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पंचास्तिकाय में मुख्य रूप से पाँच अस्तिकाय द्रव्य बताए गए हैं, और फिर अलग से काल द्रव्य (समय) का वर्णन आता है। संक्षेप में:
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१. जीवास्तिकाय (जीव द्रव्य)
- जो चेतन (आत्मा) है – सुख-दुःख भोगने वाला।
- अनादि, अनंत, नाशरहित।
- ज्ञान, दर्शन, सुख, वीर्य आदि अनंत गुणों वाला।
- संसार में बंधन की अवस्था में, और सिद्ध अवस्था में बंधन से मुक्त।
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२. पुद्गलास्तिकाय (पुद्गल द्रव्य)
- जो रूप, रस, गंध, स्पर्श वाला जड़ पदार्थ है।
- सूक्ष्म रूप: कर्मवर्गणा, मन-वर्गणा आदि।
- स्थूल रूप: शरीर, जल, पत्थर, वायु आदि।
- संयोग–वियोग (पुँनः-ग्रहण और त्याग) इसकी विशेषता है।
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३. धर्मास्तिकाय (धर्म द्रव्य)
- यह “पुण्य-पाप धर्म” नहीं,
- जहां यह द्रव्य है, वहीं जीव-पुद्गल गति कर सकते हैं।
- स्वयं न चलता है, पर चलने में सहायक है।
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४. अधर्मास्तिकाय (अधर्म द्रव्य)
- यह “पाप” नहीं,
- जहां यह है, वहाँ जीव–पुद्गल ठहर सकते हैं।
- स्वयं स्थिर है, दूसरों के स्थिर होने में सहायक।
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५. आकाशास्तिकाय (आकाश द्रव्य)
- सभी द्रव्यों को “स्थान देने वाला” द्रव्य।
- उसके बिना किसी का अस्तित्व संभव नहीं।
- लोकाकाश (जहाँ जीव–अजीव द्रव्य हैं)
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६. काल द्रव्य (समय)
- पंचास्तिकाय के बाद अलग से वर्णित।
- परिवर्तन, उत्पत्ति–व्यय–ध्रौव्य का कारण बनने वाला।
- बिना काल के किसी भी परिणाम (परिवर्तन) की कल्पना नहीं।
- अत्यन्त सूक्ष्म “समय-परमाणु” (समय के अंश) से बना माना जाता है।
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संक्षेप:
- पाँच अस्तिकाय द्रव्य: जीव, पुद्गल, धर्म, अधर्म, आकाश – ये “काय” (अनंत प्रदेशों का समूह) रूप हैं, इसलिए पंचास्तिकाय।
- एक काल द्रव्य: समय – जो सब परिवर्तनों का आधार है, पर अस्तिकाय नहीं कहलाता।
छः द्रव्य का यही स्वरूप जैन दर्शन का मूल सिद्धांत है। और सरल पढ़ने के लिए आप यह लेख देख सकते हैं