पंचास्तिकाय गाथा नंबर 9 विस्तार मे बताओ
सबसे पहले मूल गाथा (प्राकृत):
पंचास्तिकाय गाथा ९
> दवियदि गच्छदि ताइं ताइं सब्भावपज्जयाइं जं । > दवियं तं भण्णंति हि अणण्णभूदं तु सत्तादो ॥९॥
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1. सरल शब्दों में पद‑पद का अर्थ
- दवियदि गच्छदि = जो (पदार्थ) बदलते हुए भी चलता है / अवस्था बदलता रहता है
- ताइं ताइं = एक‑एक स्थिति से दूसरी स्थिति में, बार‑बार
- सब्भाव‑पज्जयाइं = अपने ही स्वभावरूप भाव‑पर्यायों में (अपनी ही प्रकृति के अनुसार होने वाले रूपों में)
पहली पंक्ति का सार: > जो वस्तु अपनी ही स्वभाव वाली भाव‑पर्यायों में, एक‑एक अवस्था से दूसरी अवस्था में लगातार परिवर्तित होती रहती है…
- दवियं तं भण्णंति = उसे ही आचार्य लोग द्रव्य कहते हैं
- हि = निश्चय ही / वास्तव में
- अणण्ण‑भूदं = जो किसी और से भिन्न वस्तु नहीं बन जाती, अन्य से एकदम अलग अस्तित्व में नहीं टूटती
- तु सत्तादो = उसके सत्ता (अस्तित्व) की दृष्टि से
दूसरी पंक्ति का सार: > ऐसी वस्तु, जिसकी सत्ता (अस्तित्व) तो नहीं बदलती, पर उसकी अवस्थाएँ बदलती रहती हैं – उसे ही सभी आचार्य द्रव्य कहते हैं।
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2. सरल हिंदी अर्थ (एक साथ)
> जो पदार्थ अपनी ही स्वभाव‑युक्त भाव‑पर्यायों में, एक‑एक अवस्था से दूसरी अवस्था में निरंतर परिवर्तित होता रहता है, परंतु अस्तित्व की दृष्टि से किसी दूसरी वस्तु में नहीं बदल जाता – उसे ही आचार्य “द्रव्य” कहते हैं।
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3. विस्तार से भावार्थ (बहुत आसान भाषा में)
(क) द्रव्य क्या है? – इस गाथा का मुख्य विषय
इस ९वीं गाथा में आचार्य कुन्दकुन्द “द्रव्य” की परिभाषा दे रहे हैं। जैन दर्शन में हर वस्तु के तीन पहलू माने जाते हैं:
- द्रव्य – मूल सत्ता, आधार (जो हमेशा बना रहता है)
- गुण – द्रव्य के साथ हमेशा रहने वाले गुण (जैसे – ज्ञान, दर्शन आदि)
- पर्याय – हर क्षण बदलती हुई विशेष अवस्था, रूप, स्थिति
यह गाथा बताती है कि:
- द्रव्य वह है जो
इसी को आगे की गाथाएँ (१०‑११) में उत्पाद‑व्यय‑ध्रुवा (उत्पत्ति, विनाश, ध्रुवता) से और स्पष्ट किया गया है।
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(ख) “दवियदि गच्छदि ताइं ताइं सब्भाव‑पज्जयाइं”
इसका भाव:
- द्रव्य स्थिर जड़ नहीं है; उसमें निरंतर परिवर्तन चलता रहता है।
- पर यह परिवर्तन अपने ही स्वभाव के भीतर होता है;
- हर क्षण नई पर्याय (नई अवस्था) आती है और पुरानी चली जाती है, पर
इसे ही गाथा कहती है – सब्भाव‑पज्जयाइं – अपने ही स्वभाव के अनुरूप भाव‑पर्यायों में घूमना।
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(ग) “दवियं तं भण्णंति हि अणण्ण‑भूदं तु सत्तादो”
यहाँ दो मुख्य बातें हैं:
- उसे ही द्रव्य कहते हैं
जिसे हम ऊपर समझे – - जिसमें निरंतर परिवर्तन हो, - पर वह दूसरे द्रव्य में नहीं बदल जाता, - उसका अस्तित्व बना रहता है।
- अणण्ण‑भूदं तु सत्तादो
- सत्ता की दृष्टि से वह “अन्य नहीं बना” - यानी: - आत्मा, आत्मा ही रहती है – वह पुद्गल नहीं बन जाती। - पुद्गल, पुद्गल ही रहता है – वह धर्म‑द्रव्य नहीं बन जाता। - रूप, रंग, आकार (पर्याय) बदल सकते हैं, पर द्रव्य अपने‑आप में वही रहता है।
इससे जैनों की मुख्य बात प्रकट होती है:
> “परिवर्तन होता है, पर मूल द्रव्य नहीं मिटता – उसकी सत्ता ध्रुव रहती है।”
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4. उदाहरण से समझें
1. सोने का उदाहरण
- सोने की दुकान में रखा सोना
- रूप, नाम, कीमत – सब बदलते हैं (ये पर्याय हैं),
- पर सोना सोना ही रहता है (यह द्रव्य है)।
- वह किसी दिन चाँदी नहीं बन जाता –
2. आत्मा का उदाहरण
- जीव कभी नरक में, कभी मनुष्य, कभी देव, कभी तिर्यंच –
- पर भीतर की आत्मा – जानने‑देखने की शक्ति वाली सत्ता – वही रहती है,
- इसीलिए कहा –
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5. दिगम्बर‑श्वेताम्बर मत की दृष्टि से
- यह ग्रंथ (पंचास्तिकाय प्राभृत / संग्रह)
- गाथा ९ का सिद्धांत –
- अंतर प्रायः टीका‑व्याख्या की शैली और कुछ शब्दों की व्याख्या में होता है;
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संक्षेप में: गाथा ९ यह सिखाती है कि –
- जगत का प्रत्येक द्रव्य
- यही जैन धर्म का विशेष दृष्टिकोण है –