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    पंचास्तिकाय गाथा नंबर 9 विस्तार मे बताओ

    7 months ago 106

    सबसे पहले मूल गाथा (प्राकृत):

    पंचास्तिकाय गाथा ९

    > दवियदि गच्छदि ताइं ताइं सब्भावपज्जयाइं जं । > दवियं तं भण्णंति हि अणण्णभूदं तु सत्तादो ॥९॥

    ---

    1. सरल शब्दों में पद‑पद का अर्थ

    • दवियदि गच्छदि = जो (पदार्थ) बदलते हुए भी चलता है / अवस्था बदलता रहता है
    • ताइं ताइं = एक‑एक स्थिति से दूसरी स्थिति में, बार‑बार
    • सब्भाव‑पज्जयाइं = अपने ही स्वभावरूप भाव‑पर्यायों में (अपनी ही प्रकृति के अनुसार होने वाले रूपों में)

    पहली पंक्ति का सार: > जो वस्तु अपनी ही स्वभाव वाली भाव‑पर्यायों में, एक‑एक अवस्था से दूसरी अवस्था में लगातार परिवर्तित होती रहती है…

    • दवियं तं भण्णंति = उसे ही आचार्य लोग द्रव्य कहते हैं
    • हि = निश्चय ही / वास्तव में
    • अणण्ण‑भूदं = जो किसी और से भिन्न वस्तु नहीं बन जाती, अन्य से एकदम अलग अस्तित्व में नहीं टूटती
    • तु सत्तादो = उसके सत्ता (अस्तित्व) की दृष्टि से

    दूसरी पंक्ति का सार: > ऐसी वस्तु, जिसकी सत्ता (अस्तित्व) तो नहीं बदलती, पर उसकी अवस्थाएँ बदलती रहती हैं – उसे ही सभी आचार्य द्रव्य कहते हैं।

    ---

    2. सरल हिंदी अर्थ (एक साथ)

    > जो पदार्थ अपनी ही स्वभाव‑युक्त भाव‑पर्यायों में, एक‑एक अवस्था से दूसरी अवस्था में निरंतर परिवर्तित होता रहता है, परंतु अस्तित्व की दृष्टि से किसी दूसरी वस्तु में नहीं बदल जाता – उसे ही आचार्य “द्रव्य” कहते हैं।

    ---

    3. विस्तार से भावार्थ (बहुत आसान भाषा में)

    (क) द्रव्य क्या है? – इस गाथा का मुख्य विषय

    इस ९वीं गाथा में आचार्य कुन्दकुन्द “द्रव्य” की परिभाषा दे रहे हैं। जैन दर्शन में हर वस्तु के तीन पहलू माने जाते हैं:

    1. द्रव्य – मूल सत्ता, आधार (जो हमेशा बना रहता है)
    2. गुण – द्रव्य के साथ हमेशा रहने वाले गुण (जैसे – ज्ञान, दर्शन आदि)
    3. पर्याय – हर क्षण बदलती हुई विशेष अवस्था, रूप, स्थिति

    यह गाथा बताती है कि:

    • द्रव्य वह है जो
    - अंदर‑अंदर बदलता रहता है (पर्याय बदलती रहती हैं), - पर उसकी मूल सत्ता (सत्ता / अस्तित्व) बनी रहती है, - और वह किसी दूसरे द्रव्य में बदल नहीं जाता।

    इसी को आगे की गाथाएँ (१०‑११) में उत्पाद‑व्यय‑ध्रुवा (उत्पत्ति, विनाश, ध्रुवता) से और स्पष्ट किया गया है।

    ---

    (ख) “दवियदि गच्छदि ताइं ताइं सब्भाव‑पज्जयाइं”

    इसका भाव:

    • द्रव्य स्थिर जड़ नहीं है; उसमें निरंतर परिवर्तन चलता रहता है।
    • पर यह परिवर्तन अपने ही स्वभाव के भीतर होता है;
    - सोना – कभी हार, कभी अंगूठी, कभी बिस्कुट रूप में; - मिट्टी – कभी घड़ा, कभी दीया, कभी ईंट।
    • हर क्षण नई पर्याय (नई अवस्था) आती है और पुरानी चली जाती है, पर
    - जो “सोना” है, वह सोना ही रहता है, - जो “मिट्टी” है, वह मिट्टी ही रहती है।

    इसे ही गाथा कहती है – सब्भाव‑पज्जयाइं – अपने ही स्वभाव के अनुरूप भाव‑पर्यायों में घूमना।

    ---

    (ग) “दवियं तं भण्णंति हि अणण्ण‑भूदं तु सत्तादो”

    यहाँ दो मुख्य बातें हैं:

    1. उसे ही द्रव्य कहते हैं

    जिसे हम ऊपर समझे – - जिसमें निरंतर परिवर्तन हो, - पर वह दूसरे द्रव्य में नहीं बदल जाता, - उसका अस्तित्व बना रहता है।

    1. अणण्ण‑भूदं तु सत्तादो

    - सत्ता की दृष्टि से वह “अन्य नहीं बना” - यानी: - आत्मा, आत्मा ही रहती है – वह पुद्गल नहीं बन जाती। - पुद्गल, पुद्गल ही रहता है – वह धर्म‑द्रव्य नहीं बन जाता। - रूप, रंग, आकार (पर्याय) बदल सकते हैं, पर द्रव्य अपने‑आप में वही रहता है।

    इससे जैनों की मुख्य बात प्रकट होती है:

    > “परिवर्तन होता है, पर मूल द्रव्य नहीं मिटता – उसकी सत्ता ध्रुव रहती है।”

    ---

    4. उदाहरण से समझें

    1. सोने का उदाहरण

    • सोने की दुकान में रखा सोना
    - कभी हार, कभी कड़ा, कभी चेन बनाया जाता है।
    • रूप, नाम, कीमत – सब बदलते हैं (ये पर्याय हैं),
    • पर सोना सोना ही रहता है (यह द्रव्य है)।
    • वह किसी दिन चाँदी नहीं बन जाता –
    यही है – अणण्ण‑भूदं तु सत्तादो (दूसरे द्रव्य में नहीं बदलना)।

    2. आत्मा का उदाहरण

    • जीव कभी नरक में, कभी मनुष्य, कभी देव, कभी तिर्यंच –
    - देह, नाम, सुख‑दुःख, ज्ञान की मात्रा – सब बदलते रहते हैं (ये पर्याय हैं)।
    • पर भीतर की आत्मा – जानने‑देखने की शक्ति वाली सत्ता – वही रहती है,
    - वह कभी पुद्गल या धर्म‑द्रव्य नहीं बनती।
    • इसीलिए कहा –
    > “जिसकी सत्ता नहीं मिटती, पर भाव‑पर्याय बदलते रहते हैं – वही द्रव्य है।”

    ---

    5. दिगम्बर‑श्वेताम्बर मत की दृष्टि से

    • यह ग्रंथ (पंचास्तिकाय प्राभृत / संग्रह)
    - आचार्य कुन्दकुन्द की रचना है, जो दिगम्बर परम्परा के महान आचार्य हैं।
    • गाथा ९ का सिद्धांत –
    - द्रव्य‑गुण‑पर्याय, - उत्पाद‑व्यय‑ध्रुवा (स्थिर सत्ता और बदलती पर्याय) – ये सिद्धांत दोनों परम्पराओं (दिगम्बर और श्वेताम्बर) में मान्य हैं।
    • अंतर प्रायः टीका‑व्याख्या की शैली और कुछ शब्दों की व्याख्या में होता है;
    मूल तत्त्व – कि द्रव्य बदलते पर्यायों सहित भी अस्तित्व से नाशवान नहीं है – सबमें एक‑सा ही है।

    ---

    संक्षेप में: गाथा ९ यह सिखाती है कि –

    • जगत का प्रत्येक द्रव्य
    - नित्य भी है (सत्ता की दृष्टि से) - और अनित्य भी है (पर्याय की दृष्टि से)।
    • यही जैन धर्म का विशेष दृष्टिकोण है –
    “न पूर्ण नाश, न पूर्ण अचलता – बल्कि नित्य द्रव्य में अनित्य पर्यायों का निरंतर प्रवाह।”

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