पंचासतीकाय की व्याख्या करके जिवस्तिकाय का विचेचन करो
सबसे पहले संक्षेप में पंचास्तिकाय, फिर उसी के आधार पर जीवास्तिकाय का विश्लेषण करते हैं।
---
१. पंचास्तिकाय क्या है?
जैन दार्शनिक परम्परा में (विशेषतः आचार्य कुन्दकुन्द की ‘पंचास्तिकाय’ में) इस विश्व को ६ द्रव्यों में बाँटा गया है:
- जीव
- पुद्गल (पदार्थ, पिण्डरूप द्रव्य)
- धर्म द्रव्य (गति का उपादान कारण)
- अधर्म द्रव्य (विश्राम / स्थित रहने का उपादान कारण)
- आकाश द्रव्य
- काल द्रव्य (समय)
इनमें से ५ द्रव्य “अस्तिकाय” कहलाते हैं:
- जीवास्तिकाय
- पुद्गलास्तिकाय
- धर्मास्तिकाय
- अधर्मास्तिकाय
- आकाशास्तिकाय
काल (समय) अस्तिकाय नहीं है, इसलिए “पंच + अस्तिकाय” = पंचास्तिकाय।
अस्तिकाय का साधारण अर्थ: जिस द्रव्य के अनन्त देश (अणु-देश / प्रादेश) हों और जो किसी विस्तृत क्षेत्र में व्याप्त हो, उसे अस्तिकाय द्रव्य कहा जाता है।
अब इन्हीं पाँचों में से जीवास्तिकाय (जीव द्रव्य) का थोड़ा गहराई से विश्लेषण करते हैं।
---
२. जीवास्तिकाय का मूल अर्थ
जीवास्तिकाय = जीव + अस्ति + काय
- जीव = चेतन द्रव्य (conscious being)
- अस्ति = जो वास्तव में है, अस्तित्व रखता है
- काय = अनेक देशों से युक्त विस्तृत सत्ता
अर्थात् – ऐसा चेतन द्रव्य जो वास्तव में सिद्ध है, जिसका अनन्त देश हैं और जो अपने-अपने शरीर के अनुसार विस्तृत है – वह जीवास्तिकाय है।
श्वेताम्बर व दिगम्बर – दोनों परम्पराओं में
- जीव द्रव्य की मूल पहचान (चेतन, ज्ञान-दर्शनयुक्त, कर्ता-भोक्ता, कर्मबंधनशील, आदि) में मूलभूत एकमत है।
- आचार्य कुन्दकुन्द की ‘पंचास्तिकाय’, ‘समयसार’ आदि ग्रन्थ दिगम्बर परम्परा के मूल ग्रन्थ हैं; परन्तु जीव-द्रव्य का जो स्वरूप वहाँ बताया गया है, वही तत्त्वतः श्वेताम्बर आगमों में भी स्वीकार है।
---
३. पंचास्तिकाय की दृष्टि से “जीव” की पहचान
पंचास्तिकाय में जीव को समझने के कुछ मुख्य बिन्दु:
(क) चेतनता (चैतन्य)
- जीव का स्वभाव ही चेतना है।
- यह चेतना दो मुख्य रूप में प्रकट होती है –
जब कहीं भी सच्चा ज्ञान-दर्शन है, समझिए वहाँ जीव-द्रव्य है।
---
(ख) उपयोग – जीव की खास पहचान
आचार्यों ने जीव की विशेष पहचान के लिए शब्द दिया है – “उपयोग”।
- जहाँ ज्ञान-दर्शन का प्रवाह (उपयोग) है, वह जीव है।
- उपयोग रहित कोई भी पदार्थ – जीव नहीं हो सकता (जैसे पत्थर, लोहा, जल – ये सब अजीव हैं)।
इसीलिए कहा जाता है – उपयोग ही आत्मा की पहचान है।
---
(ग) अमूर्त होना
- जीव अमूर्त (रूप-रहित) द्रव्य है –
जैसे –
- हाथी का जीव हाथी के पूरे शरीर में,
- चींटी का जीव चींटी के पूरे शरीर में,
- मनुष्य का जीव मनुष्य के पूरे शरीर में – एक-सा व्याप्त होता है; पर स्वयं आत्मा रंग, रूप, मोटाई से रहित है।
---
(घ) अनन्त देशों वाला – “अस्तिकाय” रूप
जीवास्तिकाय द्रव्य में:
- अनन्त प्रादेश / देश होते हैं (बहुत अत्यन्त सूक्ष्म देश),
- इसलिए वह काय / शरीरवान द्रव्य कहलाता है – पर यह सूक्ष्म आध्यात्मिक शरीर नहीं, स्वयं द्रव्य की अनन्त देशात्मकता है।
यही कारण है कि –
- जीव एक देश में सीमित छोटा-सा बिन्दुरूप नहीं है,
- वह अनन्त देशों से युक्त व्यापक सत्ता है – इसलिए अस्तिकाय है।
---
(ङ) कर्ता-भोक्ता (कर्म-संयोगी जीव)
पंचास्तिकाय आदि में जीव के बारे में यह भी बताया है कि:
- संसार में घूमते हुए जीव कर्मों का बंध करता है (राग-द्वेष से),
- उन्हीं कर्मों के अनुसार सुख-दुःख, जन्म-मरण आदि फल भोगता भी है।
अर्थात –
- कर्तृत्व (कर्म करना) और
- भोक्तृत्व (फल भोगना) –
मुक्त सिद्ध जीव में अब न तो नये कर्मों का बंध है, न पुराने कर्म शेष हैं; इसलिए वहाँ केवल शुद्ध ज्ञान-दर्शन का अनन्त प्रकाश रह जाता है।
---
(च) जीव के मुख्य भेद (संक्षेप में)
पंचास्तिकाय परम्परा के अनुसार, बहुत विस्तार से भेद गिनाए गए हैं; यहाँ सरल रूप में:
- संसारी जीव – जो शरीर, इन्द्रिय और कर्म से बंधे हैं।
- मुक्त / सिद्ध जीव – जिन्होंने सम्यक दर्शन-ज्ञान-चारित्र से कर्म क्षय कर मोक्ष पाया।
संसारी जीवों को आगे साधारण रूप से दो भाग में भी समझते हैं:
- स्थावर जीव – एक इन्द्रिय, जो स्थिर प्रकृति वाले हैं (पृथ्वी-काय, जल-काय, अग्नि-काय, वायु-काय, वनस्पति-काय)।
- त्रस जीव – जो चल-फिर सकते हैं, २ से ५ इन्द्रिय तक (कीट, पक्षी, पशु, मनुष्य आदि)।
ये सब जीवास्तिकाय द्रव्य के ही विविध पर्याय (परिणाम) हैं।
---
४. पंचास्तिकाय के सन्दर्भ में जीवास्तिकाय का महत्त्व
पंचास्तिकाय ग्रन्थ में:
- पहले छः द्रव्यों और पाँच अस्तिकायों का सामान्य वर्णन,
- फिर विशेष रूप से जीवास्तिकाय का विस्तार से वर्णन आता है
उद्देश्य:
- जीव को समझाते-समझाते आचार्य यह दिखाते हैं कि –
इसीलिए कहा जाता है – पंचास्तिकाय को ठीक से समझने वाला, विशेषतः जीवास्तिकाय को “अर्थ करके अनुभव” में लेने वाला पुरुष, वास्तविक मोक्षमार्ग पर चल पड़ता है।
---
संक्षेप निचोड़:
- पंचास्तिकाय = पाँच अस्तिकाय द्रव्य – जीव, पुद्गल, धर्म, अधर्म, आकाश।
- इनमें से जीवास्तिकाय – चेतन, ज्ञान-दर्शनयुक्त, अमूर्त, अनन्त-देशात्मक द्रव्य है,
- जो कर्म से बन्धित होने पर संसार में,
- और कर्म-विरहित होने पर सिद्धशिला पर मुक्त अवस्था में रहता है।
इसी जीवास्तिकाय की सही पहचान और आत्मानुभव ही जैन दर्शन का लक्ष्य है।