Q: पंचासतीकाय की व्याख्या करके पुदलगलकाय विचेचन करो
१. पंचास्तिकाय क्या है? (संक्षिप्त व्याख्या)
जैन दर्शन में
- छः द्रव्य माने गए हैं –
इनमें से
- पाँच द्रव्य ऐसे हैं जो अनन्त प्रदेशों (space‑points) में व्याप्त होते हैं – इन्हें ही
ये पाँच अस्तिकाय हैं –
- जीवास्तिकाय – जीव द्रव्य
- पुद्गलास्तिकाय – पुद्गल द्रव्य
- धर्मास्तिकाय – गति का उपादान कारण
- अधर्मास्तिकाय – स्थिरता (स्थिति) का उपादान कारण
- आकाशास्तिकाय – सबको स्थान देने वाला
काल द्रव्य केवल एक प्रदेश माना गया है, इसलिए उसे अस्तिकाय नहीं कहा जाता, केवल द्रव्य कहा जाता है।
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२. पुद्गलास्तिकाय – मूल अर्थ
“पुद्गल” = “पु” (पुनः) + “ग͟ल” (गलन = विघटन) अर्थात् जो सतत
- संयोग (मिलना, जुड़ना)
- और वियोग (छूटना, टूटना)
इसी पुद्गल द्रव्य के अनन्त प्रदेशों से बना समुच्चय = पुद्गल‑अस्तिकाय।
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३. पुद्गल के मुख्य लक्षण
पुद्गल द्रव्य के चार अनिवार्य सामान्य गुण (सभी द्रव्यों में समान) –
- अस्तित्व (अवगाहन) – है, कभी नष्ट नहीं होता, केवल रूप बदलता है।
- वस्तुत्व – जानने/पहचानने योग्य है।
- द्रव्यात्व – गुण‑पर्याय सहित सतत अस्तित्व।
- परिकल्पितत्व आदि सामान्य गुण।
पुद्गल के विशेष (अपना‑अपना) गुण –
- रूप (रंग)
- रस (स्वाद)
- गन्ध (गंध/सुगंध‑दुर्गंध)
- स्पर्श (स्पर्श = ठंडा‑गरम, कोमल‑कठोर आदि)
यही चार विशेष गुण जैन आगम में पुद्गल की पहचान माने गए हैं। जहाँ ये चार नहीं हैं – वह पुद्गल नहीं (जैसे: जीव, धर्म, अधर्म, आकाश, काल)।
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४. पुद्गल का सूक्ष्मतम रूप – परमाणु और स्कंध
- परमाणु (पुडा)
- पुद्गल का सबसे सूक्ष्म, अविभाज्य प्रदेश। - एक ही प्रदेश वाला, इसलिए स्वयं अकेला हो तो काय नहीं कहलाता, परन्तु अनन्त ऐसे परमाणु समूह बनाकर पुद्गलास्तिकाय के प्रदेश बनाते हैं।
- स्कन्ध (समूह)
- अनेक परमाणुओं का समूह = स्कन्ध (जैसे: जल, पवन, पथ्थर, शरीर आदि)। - इन्हीं स्कन्धों में आकार, घनत्व, भार आदि भेद दिखाई देते हैं।
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५. पुद्गल के भेद – स्थूल से सूक्ष्म तक
परम्परागत रूप से पुद्गल को चार प्रमुख स्तरों में समझाया जाता है –
- अत्यन्त स्थूल पुद्गल
- जैसे: पत्थर, लकड़ी, धातु, शरीर, भोजन, पानी, अग्नि जो आँखों से दिखता‑छूता है।
- स्थूल पुद्गल
- जैसे: हवा, धुआँ, वाष्प, धूलकण – थोड़ा सूक्ष्म, पर साधारण साधन से दिख‑महसूस हो सकते हैं।
- सूक्ष्म पुद्गल
- जैसे: वायु के अति सूक्ष्म कण, जो साधारण इन्द्रियों से प्रत्यक्ष न हों।
- अत्यन्त सूक्ष्म पुद्गल (अति‑सूक्ष्म)
- कर्म पुद्गल – जो जीव से बन्ध होकर कर्म शरीर बनाता है, - इन्हें केवल केवलज्ञानी ही प्रत्यक्ष जानते हैं, सामान्य इन्द्रिय से नहीं।
इन्हीं से संबन्धित दो मुख्य शरीर रूप –
- औदारिक शरीर – हमारा स्थूल देह (हड्डी, माँस, रक्त, इन्द्रियाँ आदि)।
- कर्मण शरीर – सूक्ष्म कर्म पुद्गल का समूह, जो पुण्य‑पाप के रूप में जीव से बँधा रहता है।
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६. पुद्गल‑अस्तिकाय की विशेषताएँ (विचेचन)
पंचास्तिकाय के क्रम में पुद्गल की विवेचना, कुछ मुख्य बिन्दु में –
- अनादि‑अनन्त
- पुद्गल द्रव्य न कभी पहली बार बना, न कभी नष्ट होगा। - केवल संयोग‑वियोग, रूप परिवर्तन से विभिन्न पिण्ड (पदार्थ) बनते‑बिगड़ते हैं।
- देशपरिणामी
- हर क्षण इसकी पर्याय (स्थिति, रूप) बदलती रहती है – गरम‑ठंडा, ठोस‑द्रव‑वाष्प, भारी‑हल्का आदि। - परन्तु द्रव्य रूप से वही पुद्गल बना रहता है, यह जैनों का द्रव्य‑पर्याय सिद्धान्त है।
- जीव के लिए बन्ध‑उपादान
- पुद्गल ही कर्म रूप में जीव से बँधता है। - सुख‑दुःख का अनुभव, इन्द्रियों के विषय (रूप, रस, गन्ध, स्पर्श), सब पुद्गल की विविध पर्यायों से होते हैं।
- अनन्त प्रदेश वाला होने से “अस्तिकाय”
- पुद्गल द्रव्य में अनन्त प्रादेश (space‑points) हैं, - इसलिए यह केवल द्रव्य ही नहीं, अस्तिकाय भी है।
- स्थान‑सीमा (आवगाहन)
- सम्पूर्ण लोकाकाश (जहाँ तक संसार है) में पुद्गल भरा हुआ है। - लोक के बाहर (अलोकाकाश) केवल शुद्ध आकाश द्रव्य है, पुद्गल नहीं।
- अन्य द्रव्यों से भेद
- जीव – चेतन, ज्ञान‑दर्शन वाला, जबकि पुद्गल अचेतन है। - धर्म/अधर्म – गति/स्थित का केवल उपादान कारण हैं, न रूप, रस, गन्ध, स्पर्श इनमें हैं। - आकाश – केवल स्थान‑दायी; यह भी निराकार, निरस्पर्श है। - काल – परिवर्तन में सहायक, एक‑प्रदेशी; न रंग‑रस‑गन्ध‑स्पर्श, न काय‑स्वरूप।
इस प्रकार, पुद्गलास्तिकाय = अनादि‑अनन्त, अचेतन द्रव्य, जिसमें रंग‑रस‑गन्ध‑स्पर्श के गुण, अनन्त प्रदेश, परमाणु से लेकर स्थूल शरीरों तक सभी भौतिक पदार्थ, और कर्म‑शरीर सहित जीव से बन्धने वाला सारा द्रव्य शामिल है।
इसी की विस्तृत तत्त्व‑चर्चा आचार्य कुन्दकुन्द देव ने “पंचास्तिकाय‑प्राभृत/संग्रह” में की है।