प्रातः कालीन नित्य पाठ प्रस्तुत करे
नीचे एक सरल प्रातःकालीन नित्य पाठ दिया जा रहा है, जिसे कोई भी श्रावक/श्राविका घर पर रोज़ कर सकता है। (विभिन्न पंथों व परम्पराओं में क्रम और सूत्र थोड़े अलग हो सकते हैं, यह एक सामान्य रूप है।)
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1. नवरकार / णमोकार महामंत्र
णमो अरिहंताणं। णमो सिद्धाणं। णमो आयरियाणं। णमो उवज्झायाणं। णमो लोए सव्वसाहूणं।।
एसो पंच णमोक्कारो, सव्व पावप्पणासणो। मंगलाणं च सव्वेसिं, पढमं हवइ मंगलं।।
सरल अर्थ: मैं अरिहंत, सिद्ध, आचार्य, उपाध्याय और समस्त साधु‑साध्वियों को नमस्कार करता हूँ। इन पाँच परमेष्ठियों को किया गया नमस्कार सब पापों का नाश करने वाला है और सब मंगलों में प्रथम मंगल है।
(नवरकार मंत्र के बारे में अधिक पढ़ने के लिए देखें )
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2. चत्तारि मंगलं (चार मंगल)
चत्तारि मंगलं – अरिहंत मंगलं, सिद्ध मंगलं, साहू मंगलं, केवलि‑पण्णत्तो धम्मो मंगलं।।
सरल अर्थ: चार वस्तु मंगल हैं – अरिहंत, सिद्ध, साधु और केवलज्ञानियों द्वारा प्रतिपादित धर्म – ये सब मंगलस्वरूप हैं।
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3. चत्तारि लोगुत्तमा
चत्तारि लोगुत्तमा – अरिहंत लोगुत्तमा, सिद्ध लोगुत्तमा, साहू लोगुत्तमा, केवलि‑पण्णत्तो धम्मो लोगुत्तमा।।
सरल अर्थ: चार ही परम श्रेष्ठ (लोगों में उत्तम) हैं – अरिहंत, सिद्ध, साधु और केवलज्ञानी द्वारा प्रतिपादित धर्म।
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4. क्षमापना (सर्व जीवों से क्षमा)
खम्मेमि सव्वे जीवे, सव्वे जीवा खमंतु मे। मित्ति मे सव्व भूएसु, वेरं मज्झ न केणइ।।
सरल अर्थ: मैं सभी जीवों को क्षमा करता हूँ, और सभी जीव मुझे क्षमा करें। सभी भूतों से मेरी मित्रता हो, मेरा किसी से वैर न हो।
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5. मिच्छामी दुक्कडं (पछतावा)
मिच्छामी दुक्कडं।
सरल अर्थ: जो भी गलतियाँ मुझसे कृत, विकृत, चिन्तित या वाचित हुईं, उनके लिए मैं हृदय से पछताता हूँ – “मेरे द्वारा हुआ दुख व्यर्थ हो जाए।”
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6. दिन के लिए शुभ संकल्प
अन्त में शांत भाव से 1–2 मिनट मौन बैठकर मन में ऐसा भाव करें:
- आज अहिंसा, सत्य, अपरिग्रह का यथाशक्ति पालन करूँगा/करूँगी।
- क्रोध, मान, माया, लोभ से बचने का प्रयास करूँगा/करूँगी।
- किसी जीव को जान‑बूझकर कष्ट नहीं पहुँचाऊँगा/गी।
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यही एक सरल प्रातःकालीन नित्य पाठ है जिसे रोज़ प्रातः स्नान आदि के बाद शुद्ध स्थान पर बैठकर किया जा सकता है। समय होने पर आप इसके बाद थोड़ी स्वाध्याय (Jain ग्रन्थ का अध्ययन) भी जोड़ सकते हैं।