Dhyan ghata pragtaviye, vada nayan jin dhup, much chhut durgandh dur tade, pragate aatma swaropp
इस पंक्ति का सरल अर्थ (अर्थ) इस तरह है:
ध्यान घट प्रगटाविये – अपने “घट” (शरीर / अंतर‑हृदय) में ध्यान का दीपक जलाइए। मतलब: भीतर शान्त बैठकर आत्मा पर एकाग्र ध्यान कीजिए।
वडा नयन जिन धूप – जिनेन्द्र भगवान (जिन) के प्रति उच्च, निर्मल दृष्टि (सम्यक दर्शन) को धूप बनाइए। मतलब: भगवान के गुणों का स्मरण और उन पर श्रद्धा – यह हमारी अंतर की “धूप” है।
मुख छूट दुर्गंध दूर तडे – जब मुख से निकलने वाली “दुर्गन्ध” (झूठ, कटु वचन, चुगली, निंदा, क्रोध‑भरे शब्द) छूट जाती है, तो ऐसी सारी अशुद्धियाँ दूर भाग जाती हैं।
प्रगटे आत्मा स्वरूप – तब आत्मा का सच्चा, शुद्ध स्वरूप प्रकट होता है। मतलब: जब हम ध्यान, सम्यक दृष्टि और शुद्ध वचन रखते हैं, तब भीतर आत्मा की शान्ति, पवित्रता और प्रकाश साफ अनुभव होने लगता है।
संक्षेप में: यह पंक्ति सिखाती है कि
- अंदर ध्यान का दीपक जलाओ,
- जिनेन्द्र भगवान के प्रति शुद्ध दृष्टि को धूप बनाओ,
- वाणी को झूठ, कठोरता और निंदा से निर्मल बनाओ,
यह एक भावात्मक, भक्ति‑पूर्ण पद है; इसमें कोई विशेष दिगम्बर–श्वेताम्बर भेद नहीं है, सबके लिए समान आध्यात्मिक शिक्षा है।