Dhyan ghata pragtaviye, vama Nayana jin dhup, michchhit durgandh dur tade, pragate aatma swaroop
ये पंक्ति एक सुंदर Jain stavan / prarthana की है, जिसका भाव बहुत गहरा है। शब्द थोड़ा‑बहुत अलग‑अलग पुस्तकों में मिल सकता है, पर अर्थ का सार यही रहता है:
मूल पंक्ति (आपने लिखी हुई): “Dhyan ghata pragtaviye, vama nayana jin dhup, michchhit durgandh dur tade, pragate aatma swaroop.”
नीचे आसान भाषा में अर्थ (arth):
- “Dhyan ghata pragtaviye”
– हम अपने भीतर ध्यान का घट (पात्र) प्रकट करें। – मतलब: मन को शान्त कर के, भीतर एक साफ, पवित्र पात्र जैसा बना दें, जिसमें केवल ध्यान ही भरा हो।
- “Vama nayana jin dhup”
– अपने बाएँ नेत्र (या दोनों नयन) को ऐसे बनाएं जैसे जिनेश्वर का धूप। – धूप (अगरबत्ती) सुगंध फैलाती है, वैसे ही हमारी दृष्टि/perspective पवित्र और शुभ बने, जो सब ओर शुद्धता फैलाए। – यहाँ “Jin dhup” का भाव: जिनभगवान के चरणों में भक्ति‑रूप धूप अर्पित करना, पर भीतर‑भीतर ध्यान को धूप की तरह प्रज्वलित करना।
- “Michchhit durgandh dur tade”
– “मेरी मिथ्यात्व (गलत दृष्टि), कषाय (क्रोध, मान, माया, लोभ) और भीतर की दुर्गन्ध जैसे दोष दूर हों।” – अशुभ भाव, बुरे विचार, राग‑द्वेष – ये सब जैसे बदबू हों, वे हट जाएँ। – जिन ध्यान की “धूप” से यह सब जल‑साफ हो जाए।
- “Pragate aatma swaroop”
– तब मेरे भीतर आत्मा का असली स्वरूप प्रकट हो। – यानी: शुद्ध आत्मा – जो ज्ञानस्वरूप, दर्शनस्वरूप, सुखस्वरूप है – वही अनुभव में आ जाए, वही प्रकट हो जाए।
समग्र भाव: – यह पंक्ति प्रार्थना है कि:
- मैं ऐसा ध्यान करूँ कि मेरा मन एक स्वच्छ पात्र बन जाए,
- मेरी दृष्टि जिनेश्वर की धूप जैसी पवित्र हो,
- मिथ्यात्व और कषाय रूपी दुर्गन्ध दूर हो जाए,
- और मेरे भीतर छुपा हुआ शुद्ध आत्मस्वरूप प्रकट हो जाए।
यह पूरी तरह जैन ध्यान की परंपरा से जुड़ा भाव है – बाहरी धूप‑दीप की पूजा से आगे बढ़कर, अन्तर्मुखी भक्ति और शुद्ध आत्मानुभूति की ओर ले जाने वाला।
यदि आप चाहें, तो मैं इसी पंक्ति पर आधार लेकर एक छोटी सी रोज़ की ध्यान‑साधना भी बता सकता हूँ, जिसे 5 मिनट में किया जा सके।