1. Dhūp Pūjā (incense) धूप सुगंध बिखेरे ज्यों, तप त्याग सुगंधित होय। मोह-कषाय जلے मन में, निर्मल भाव उठे सर्व-लोय॥ 2. Dīpak Pūjā (lamp) दीपक ज्योत जगे अंतर, अवगाहे आत्मा प्रकाश। अज्ञान-अंधेरा मिटे सारा, प्रगटे सम्यक् दर्शन-विलास॥ 3. Darpan Pūjā (mirror)
इन ५ पदों में हर द्रव्य‑पूजा की बहुत सुंदर “भाव‑व्याख्या” दी गई है। मैं हर एक का सरल अर्थ (अर्थार्थ) बता रहा हूँ।
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1. धूप पूजा (Dhūp Pūjā)
पद: “धूप सुगंध बिखेरे ज्यों, तप त्याग सुगंधित होय। मोह‑कषाय जले मन में, निर्मल भाव उठे सर्व‑लोय॥”
सरल अर्थ:
- जैसे धूप जलकर चारों ओर सुगंध फैला देती है,
- धूप जलती है, उसी तरह हमारे मन के मोह और कषाय (क्रोध, मान, माया, लोभ) जलकर नष्ट हों,
- और पूरे लोक में (अपने पूरे जीवन में) हमारे निर्मल, शुभ, अहिंसक भाव प्रकट हों।
भाव: धूप चढ़ाते समय सोचना है – “जैसे धूप बुरे गंध को हटाकर सुगंध देती है, वैसे ही मेरे अंदर के कषाय नष्ट हों और आत्मा की शुद्धि की सुगंध फैले।”
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2. दीपक पूजा (Dīpak Pūjā)
पद: “दीपक ज्योत जगे अंतर, अवगाहे आत्मा प्रकाश। अज्ञान‑अंधेरा मिटे सारा, प्रगटे सम्यक् दर्शन‑विलास॥”
सरल अर्थ:
- दीपक की लौ जैसे बाहर उजाला करती है,
- आत्मा का स्व‑प्रकाश, आत्म‑ज्योति प्रकट हो,
- सारा अज्ञान और मिथ्यात्व का अंधेरा मिट जाए,
- और सम्यक् दर्शन (सही दृष्टि, सही श्रद्धा) का उदय हो, उसका आनंद (विलास) प्रकट हो।
भाव: दीपक जलाते समय भाव – “हे जिनेन्द्र! जैसे यह दीपक अंधेरे को हटाता है, वैसे ही मेरे भीतर का अज्ञान दूर हो, और सम्यक् दर्शन‑ज्ञान‑चरित्र की रोशनी जगे।”
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3. दर्पण पूजा (Darpan Pūjā)
पद: “दर्पन में निज रूप देख, जाने देह सभी अनित्य। आत्मा ही शाश्वत सच्चा, रखे विवेक‑वैराग्य नित्य॥”
सरल अर्थ:
- दर्पण में हम अपना चेहरा देखते हैं –
- सच्चा, शाश्वत केवल आत्मा है।
- यह विचार रखकर हम विवेक (सही समझ) और वैराग्य (असार से विरक्ति) को
भाव: दर्पण के दर्शन से स्मरण – “मैं यह शरीर नहीं, मैं शुद्ध आत्मा हूँ। शरीर तो बदलता, बूढ़ा होता, छूट जाता है; पर आत्मा अनंत, शाश्वत है। मुझे उसी की साधना करनी है।”
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4. पंखा पूजा (Pankhā Pūjā)
पद: “पंखा शीतल वात बहाए, तैसे शीतल कर कषाय। क्रोध‑मान का ताप बुझाकर, करुणा‑वैराग्य मन लाय॥”
सरल अर्थ:
- पंखा ठंडी हवा देता है और गर्मी दूर करता है।
- उसी तरह हमें अपने अंदर के कषायों (क्रोध, मान आदि की गर्मी) को
- क्रोध और मान (अहंकार) की गर्मी बुझाकर,
- मन में करुणा (दया, अहिंसा), और वैराग्य (राग‑द्वेष से विरक्ति) को बसाना है।
भाव: पंखा चलाते या चढ़ाते समय भाव – “जैसे यह हवा तन को ठंडक देती है, वैसे ही मेरी आत्मा को भी क्रोध‑मान आदि कषायों से ठंडक मिले, और दया‑वैराग्य की ठंडी, मधुर भावना बनी रहे।”
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5. चामर पूजा (Chāmar Pūjā)
पद: “चामर डोले भक्ति‑सहित, वंदे अरिहंत महान। कर्म‑रज उड़ जाए ऐसी, हो निर्मल आत्मा पहचान॥”
सरल अर्थ:
- चामर को हम श्रद्धा‑भक्ति से भगवान के आगे घुमाते हैं।
- यह भाव से है कि हम अरिहंत परमात्मा को नमस्कार कर रहे हैं,
- जैसे चामर चलाने से धूल (रज) उड़ जाती है,
- और हम अपनी निर्मल, शुद्ध आत्मा की सच्ची पहचान प्राप्त करें।
भाव: चामर डोलाते समय सोचना – “मेरी आत्मा पर जो अनादि कर्मों की धूल चढ़ी है, वह हटे; मैं भी अरिहंतों की तरह निर्मल, वीतराग बनूँ।”
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कुल मिलाकर
इन सब पदों का मूल संदेश यही है कि:
- बाहरी द्रव्य‑पूजा (धूप, दीपक, दर्पण, पंखा, चामर…)
- असली पूजा है –
यदि आप सम्पूर्ण अष्ट‑प्रकारी पूजा के अर्थ भी जानना चाहें (जल, चंदन, पुष्प आदि सहित), तो उसका सरल विवरण यहाँ मिल सकता है