Therthanker kese bante h
जैन धर्म के अनुसार, तीर्थंकर (Tirthankara) एक विशेष आत्मा होती है, जो अनेक जन्मों की तपस्या, संयम, और पुण्य के फलस्वरूप संसार (संसार सागर) से मुक्ति के मार्ग का निर्माण करती है। तीर्थंकर बनने की प्रक्रिया को संक्षेप में इस प्रकार समझा जा सकता है:
- पुण्य कर्मों का संचय: तीर्थंकर बनने के लिए आत्मा को कई जन्मों में अत्यधिक पुण्य (शुभ कर्म) और सात्त्विकता अर्जित करनी पड़ती है। इन जन्मों में वह दान, तप, अहिंसा, सत्य, ब्रह्मचर्य, और अपरिग्रह का पालन करते हैं।
- तीर्थंकर नामकर्म बंधना: जब कोई आत्मा अत्यंत पुण्यशाली और करुणामय बन जाती है, तब उसके अगले जन्म में तीर्थंकर बनने का योग बनता है। इसे 'तीर्थंकर नामकर्म' का बंधना कहा जाता है, जो केवल विशेष पुण्य से ही होता है।
- मानव जन्म और जन्मस्थान: तीर्थंकर का जन्म हमेशा भारत (जंबूद्वीप) के आर्यखंड में, विशेष कुल और कुलीन परिवार में होता है। जन्म के समय उनके शरीर पर शुभ चिन्ह और चमत्कार देखे जाते हैं।
- संस्कार और वैराग्य: युवावस्था में वे सांसारिक सुखों का त्याग कर दीक्षा लेते हैं और कठोर तपस्या करते हैं।
- कैवल्य ज्ञान (मोक्षज्ञान): कठोर तपस्या और साधना के बाद वे कर्मों का क्षय कर देते हैं और कैवल्य (सर्वज्ञता) प्राप्त करते हैं।
- तीर्थ की स्थापना: कैवल्य प्राप्त करने के बाद तीर्थंकर धर्म तीर्थ की स्थापना करते हैं, अर्थात् वे चारो संघ (साधु, साध्वी, श्रावक, श्राविका) की रचना करते हैं और जीवों को मोक्षमार्ग का उपदेश देते हैं।
इस प्रकार, तीर्थंकर बनने के लिए असंख्य पुण्य, संयम, और तपस्या की आवश्यकता होती है, साथ ही यह केवल बहुत विशेष आत्माओं को ही प्राप्त होता है।
महत्वपूर्ण: वर्तमान अवसर्पिणी काल में केवल 24 तीर्थंकर हुए हैं, जिनमें अंतिम तीर्थंकर भगवान महावीर स्वामी हैं।