paani में जन्म लेकर paani में ख़त्म हो जाता है
“paani में जन्म लेकर paani में ख़त्म हो जाता है” ये बात सुनने में यूँ लगती है कि जैसे कोई जीव पानी से ही पैदा होता है और पानी में ही खत्म (नष्ट) हो जाता है।
लेकिन जैन दर्शन के अनुसार:
- आत्मा कभी “ख़त्म” नहीं होती
- शरीर बदलता है, नष्ट हो जाता है। - पर आत्मा (जीव) न तो बनती है, न मिटती है – वह अनादि–अनंत है। - पानी में रहने वाले जीव भी मरते नहीं, बस एक शरीर छोड़कर दूसरा शरीर धारण कर लेते हैं।
- पानी में रहने वाले जीव कौन से हैं?
जैन आगम के अनुसार पानी में असंख्य जीव रहते हैं, जैसे: - जल-कोष जीव (पानी कायिक / एकेन्द्रिय जीव) – जो पानी के ही रूप में जीवन धारण करते हैं। - छोटी–छोटी जलीय सूक्ष्म जंतु – जो हमें दिखते भी नहीं, लेकिन सब जीव हैं। इनके लिए हम कहते हैं कि वे पानी में जन्म लेते हैं, वहीं मरते भी हैं, पर यह बात उनके शरीर के लिए सही है, आत्मा के लिए नहीं।
- जैन दृष्टि से इस वाक्य की सही समझ
- पानी में शरीर धारण करके जन्म लेते हैं। - मृत्यु के बाद वही शरीर पानी में ही नष्ट हो जाता है। - पर आत्मा आगे किसी और योनि में, किसी और शरीर में जन्म ले लेती है – संसार चक्र चलता रहता है।
- अहिंसा का संदेश
जैन धर्म इसलिए सिखाता है कि: - पानी को बिना सोचे–समझे बर्बाद न करें। - जहाँ सम्भव हो, पानी को छानकर, धीरे–धीरे, कम हिंसा करते हुए प्रयोग करें। क्योंकि उसमें अनगिनत जीव रहते हैं जो लगातार जन्म–मृत्यु का दुख भोग रहे हैं।
सार में: “पानी में जन्म लेकर पानी में ख़त्म हो जाता है” – यह देह (शरीर) के लिए सही है, लेकिन आत्मा न जन्म लेती है, न मरती है, बस शरीर बदलती रहती है – यही जैन सिद्धांत है।