Ashtaprakari puja dohe
यहाँ श्वेताम्बर परम्परा में प्रचलित सरल अष्टप्रकारी पूजा के दोहे दे रहा हूँ – हर द्रव्य के लिए एक‑एक (कई जगह शब्दों में छोटे‑मोटे भेद मिलते हैं):
1️⃣ जल पूजा दोहा (Jal Puja) जल से मल सब दूर हो, अंतर का भी मले। प्रभु चरणन जल चढ़ाऊँ, कर्म कषायन जले॥
2️⃣ चन्दन / गन्ध पूजा दोहा (Chandan Puja) शुभ गंध ले कर आया हूँ, स्वीकаро हे भगवान। चित्त चन्दन सम शीतल हो, मिटे क्रोध अभिमान॥
3️⃣ पुष्प पूजा दोहा (Pushpa Puja) कोमल पुष्प चढ़ाऊँ प्रभु, कोमल होवे व्यवार। सुगंध समान हो जीवन, प्रेम दया अपार॥
4️⃣ धूप पूजा दोहा (Dhoop Puja) धूप जले तज दे अंधियारो, ज्यों भगै अज्ञान। वीर जिनेन्द्र कृपा करें, जगे आत्म ज्ञान॥
5️⃣ दीप पूजा दोहा (Deepak Puja) दीप जले तब ज्योति फैले, मिटे भव का रात। ऐसी ज्योति जगे मन भीतर, हो आत्मा की बात॥
6️⃣ अक्षत पूजा दोहा (Akshat Puja) अक्षत दान करूँ प्रभु को, यह जन्म रहे अखंड। ऐसी सिद्धि मिले मुझे, ना आवे फिर ये देहबंधन॥
7️⃣ नैवेद्य पूजा दोहा (Naivedya Puja) नैवेद्य अर्पण आज करूँ, तजूँ रसना की आस। इन्द्रिय‑जित बन साधु सम, मिले समाधि‑विलास॥
8️⃣ फल पूजा दोहा (Phal Puja) फल चढ़ाऊँ तेरे चरण में, चाहूँ मोक्ष का फल। छोड़ूँ लौकिक लोभ सब, निर्मल होवे पल‑पल॥
भाव (संक्षेप में): हर द्रव्य चढ़ाते समय यह स्मरण रहे कि
- जल = कर्म मल धुलाने की प्रेरणा
- चन्दन = शीतल ज्ञान व शान्ति
- पुष्प = सुघंधित श्रेष्ठ आचरण
- धूप = वैराग्य व संयम
- दीपक = आत्म‑ज्योति, सम्यक् ज्ञान
- अक्षत = अन्तिम जन्म की कामना
- नैवेद्य = इन्द्रिय‑संयम
- फल = मोक्ष‑फल की ही अभिलाषा
अष्टप्रकारी पूजा के अर्थ और महत्व सरल भाषा में यहाँ समझाए हैं