आज उपयोगी कल रद्दी in jainism
“आज उपयोगी, कल रद्दी” – यह वाक्य जैन प्रवचनों में बहुत बार समझाया जाता है। इसका सीधा‑सा अर्थ है:
- जो चीज़ आज धर्म और आत्मकल्याण के लिए काम आ सकती है,
जैन दृष्टि से इसमें मुख्य बातें:
- अनित्य (सब नाशवान है)
- शरीर, धन, पद, रिश्ते, समय – ये सब स्थायी नहीं हैं। - जब तक हैं, तभी इनका उपयोग पुण्य, दान, तप, स्वाध्याय, संयम में कर सकते हैं। - बाद में वही चीज़ या तो छिन जाती है, या ताक़त/इच्छा नहीं रहती – तब वह हमारे लिए “रद्दी” जैसी हो जाती है।
- समय का सदुपयोग
- “बाद में करूँगा, रिटायर होकर करूँगा, बुढ़ापे में करूँगा” – यह सोच गलत मानी जाती है। - जैन आचार्य कहते हैं: जो भी अच्छा कर सकते हो – आज ही करो। - आज का एक क्षण भी सही उपयोग हो जाए, तो वह मोक्ष‑मार्ग में सहायक बन जाता है।
- अपरिग्रह (संचय की आसक्ति छोड़ना)
- हम बहुत‑सा धन, सामान, कपड़े, गहने इकट्ठे रखते हैं – कई बार वह न खुद काम आता है, न किसी और के। - अगर उसे सही समय पर दान, सेवा, धर्मकार्य में लगा देते, तो बहुत उपयोगी होता। - बेवजह जमा‑जमा कर रखा, और जब काम ही न आया, तो वह practically “रद्दी” ही हुआ।
- युवा अवस्था का महत्व
- शरीर स्वस्थ है, बुद्धि तेज है, जिम्मेदारियाँ सँभालने की शक्ति है – यह समय तप, स्वाध्याय, संयम, गुणग्रहण के लिए सबसे उपयोगी है। - बुढ़ापे में वही शरीर, वही इंद्रियाँ कमज़ोर हो जाएँ – तब चाहकर भी वैसा अभ्यास नहीं हो पाता।
संक्षेप में:
“आज उपयोगी, कल रद्दी” हमें यह सिखाता है कि: जो भी समय, ताकत, धन, साधन, अवसर आज हमारे पास है, उसे अभी के अभी धर्म और आत्मकल्याण में लगा दें; कल तक टालेंगे, तो हो सकता है वह सब हमारे लिए केवल ‘रद्दी’ बनकर रह जाए।”