हमारा साथ अंधेरे में सबसे पहले कौन छोड़ता है in jainism
जैन दृष्टि से इस सवाल को दो तरह से समझा जा सकता है – “अंधेरा” = 1) सांसारिक संकट / कठिन समय 2) आध्यात्मिक अंधकार (अज्ञान, मोह)
1. सांसारिक नजर से – सबसे पहले कौन छोड़ता है?
जब हम कठिनाई या “अंधेरे” में आते हैं:
- पराया धन, पद, शोहरत
- सबसे पहले पैसा, पद, नाम‑यश साथ छोड़ देते हैं। - नौकरी गई, व्यापार डूबा – तो सम्मान, दोस्ती, पहचान सब बदल जाती है।
- फिर रिश्तेदार और लोग
- जो सिर्फ स्वार्थ के कारण पास थे, वे दूर हो जाते हैं। - कई बार रिश्तेदार भी दूरी बना लेते हैं, केवल कुछ ही सच्चे अपने साथ रहते हैं।
- अंत में अपना शरीर भी छोड़ देता है
- मृत्यु के समय शरीर तक साथ नहीं देता। - जैन दर्शन कहता है: जन्म के समय अकेले आए, मृत्यु के समय अकेले जाएंगे।
2. आध्यात्मिक नजर से – असली “अंधेरा” क्या है?
जैन धर्म के अनुसार असली अंधेरा बाहर का नहीं, भीतर का है – वह है अज्ञान और मोह (मोहनीय कर्म)।
- जब हम क्रोध, मान, माया, लोभ में डूब जाते हैं,
- मतलब: ज्ञान होते हुए भी हम गलत को सही मानने लगते हैं – यही आध्यात्मिक अंधेरा है।
तो जैन मत के अनुसार सार:
- बाहरी अंधेरे (संकट, दुःख, विपत्ति) में
- जीवन के अंत में शरीर भी छोड़ देता है।
- परंतु कर्म (पुण्य‑पाप) और आत्मा हमेशा साथ रहते हैं;
- आध्यात्मिक अर्थ में कहें तो
इसलिए जैन धर्म सिखाता है: बाहर के सहारे पर नहीं, अपने आत्मा और सही ज्ञान पर भरोसा रखो, क्योंकि अंत में न रिश्तेदार, न धन, न शरीर – केवल आत्मा और उसके कर्म साथ जाते हैं।