give sript for bhaktamer sloke two dhyan
Here is the 2nd shloka of Bhaktamar and a simple dhyan (meditation meaning):
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1. मूल श्लोक (Sanskrit)
यः संस्तुतः सकलवाङ्मय‑तत्त्वबोधा- दुद्भूत‑बुद्धि‑पटुभिः सुरलोक‑नाथैः । स्तोत्रैर्जगत्त्रितय‑चित्त‑हरैरुदारैः, स्तोष्ये किलाहमपि तं प्रथमं जिनेन्द्रम् ॥२॥
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2. उच्चारण (Transliteration)
yah saṁstutaḥ sakala–vāṅmaya–tattva–bodhād udbhūta–buddhi–paṭubhiḥ sura–loka–nāthaiḥ | stotraiḥ jagat–tritaya–citta–harair–udāraiḥ, stoṣye kilāham api taṁ prathamaṁ jinendram || 2 ||
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3. सरल अर्थ (Dhyan / Meaning)
जब इस श्लोक का ध्यान करते हैं, भाव ऐसे रखें:
- जिन भगवान आदिनाथ की स्तुति इंद्र आदि देवों ने की है,
- वे देव तो सारे शास्त्रों और वाङ्मय (श्रुत) का गहरा तत्त्व समझकर,
- अपनी तीक्ष्ण, ज्ञानवान बुद्धि से अत्यन्त गंभीर और मधुर स्तोत्रों द्वारा
- तीनों लोकों (देवलोक, मनुष्यलोक, नरक) के चित्त को हर लेने वाले, अद्भुत स्तोत्र गाते हैं।
ऐसे आदिनाथ जिनेन्द्र की स्तुति तो मैं भी करूँगा, भले ही मैं छोटा, अज्ञान और अल्पबुद्धि वाला हूँ; फिर भी श्रद्धा से उनके गुणों का गान करूँगा।
संक्षेप में भाव:
> “हे आदिनाथ भगवान! आपको तो देवों के राजा भी, गहन श्रुत‑ज्ञान से युक्त होकर गाते हैं; > मैं भी अपनी छोटी सी बुद्धि और सरल भावना से, आपके चरणों की ही स्तुति करूँगा।”
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4. ध्यान करते समय भाव‑चित्र (Meditation Focus)
श्लोक 2 का पाठ करते समय मन में यह चित्र बनाइए:
- सिंहासन पर विराजमान भगवान आदिनाथ की शांत, दिव्य, तेजस्वी प्रतिमा।
- चारों ओर इंद्र और देवगण folded hands से स्तुति कर रहे हैं,
- आप सबसे पीछे बैठे हैं, बहुत विनम्र भाव से,
ऐसे भाव से श्लोक पढ़ने से अहंकार घटता है, भक्ति, विनम्रता और श्रद्धा बढ़ती है – यही इस गाथा का मुख्य ध्यान है।
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यह श्लोक का पाठ और ध्यान दोनों संप्रदायों (दिगम्बर–श्वेताम्बर) में लगभग एक ही अर्थ में स्वीकार है।
भक्तामर के बारे में और जानकारी आप यहाँ पढ़ सकते हैं और इसके महत्व व पाठ के लाभों के बारे में यहाँ