कौन से दो जैन तीर्थंकर आपस में रिश्तेदार थे
वर्तमान अवसर्पिणी के 24 जैन तीर्थंकरों में से किसी भी दो को शास्त्रों में “आपस के सगे रिश्तेदार (भाई‑बहन / चचेरे भाई‑बहन जैसी निकट पारिवारिक रिश्तेदारी)” के रूप में नहीं बताया गया है।
कुछ महत्वपूर्ण बातें:
- लगभग सभी तीर्थंकर किसी न किसी कुल / वंश (जैसे इक्ष्वाकु, हरिवंश, आदि) से जुड़े हैं, इसलिए वे दूर के वंशज रूप में तो एक ही परंपरा से हो सकते हैं,
- जैन परंपरा में जो “रिश्तेदारी” ज़्यादा सुनने में आती है, वह प्रायः
- परस्पर दो तीर्थंकरों को ही खास तौर पर “फलाँ और फलाँ आपस में रिश्तेदार थे” – ऐसा कोई प्रसिद्ध और स्पष्ट उल्लेख परंपरागत जैन ग्रंथों में नहीं मिलता।
इसलिए साधारण भाषा में उत्तर यह होगा: जैन शास्त्र 24 तीर्थंकरों में से किसी विशिष्ट “दो” को आपस में सगे रिश्तेदार के रूप में नहीं बताते; वे सब अलग‑अलग काल, अलग‑अलग माता‑पिता और अलग‑अलग जीवन‑कथाओं वाले महापुरुष हैं।