Alochna path suniye arj hamari full meaning
“आलोचना पाठ” संवत्सरी/प्रतिक्रमण में बोला जाने वाला पश्चात्ताप‑पाठ है। आपने जो पंक्ति लिखी है – “आलोचना पाठ सुनिये अर्ज हमारी…” – यह वास्तव में दूसरी पंक्ति का भाग है:
> सुनिये जिन अरज हमारी, हम दोष किये अति भारी। > तिनकी अब निर्वृत्ति काजा, तुम सरन लही जिनराजा॥
नीचे पूरे आलोचना पाठ का बहुत ही सरल, सीधा अर्थ दिया है – ताकि आप भाव समझकर बोल सकें।
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1. वंदौं पाँचों परम गुरु…
श्लोक वंदौं पाँचों परम गुरु, चौबीसों जिनराज। करूँ शुद्ध आलोचना, शुद्धिकरण के काज॥ १॥
अर्थ (सरल भाषा में) मैं पाँचों परम गुरु (अrihant, सिद्ध, आचार्य, उपाध्याय, साधु) और चौबीसों तीर्थंकर भगवान को नमस्कार करता हूँ। मैं अपनी आत्मा को शुद्ध करने के लिए, पापों की सच्ची आलोचना करता/करती हूँ।
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2. सुनिये जिन अरज हमारी… (जो आपने पूछा)
श्लोक सुनिये जिन अरज हमारी, हम दोष किये अति भारी। तिनकी अब निर्वृत्ति काजा, तुम सरन लही जिनराजा॥ २॥
अर्थ हे जिन भगवान! हमारी प्रार्थना सुनिए; हमने बहुत बड़े‑बड़े पाप किए हैं। अब उन पापों का नाश हो, इस उद्देश्य से हम आपकी शरण में आए हैं।
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3. इक वे ते चउ इन्द्री वा…
अर्थ एकेन्द्रिय से लेकर चार इन्द्रिय तक (और मन सहित/मन रहित) जितने भी जीव हैं, हमने उनके प्रति दया नहीं की, निष्ठुर बनकर उनका घात (कष्ट/हत्या) किया – यह हमारा अपराध है।
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4. समरंभ समारंभ आरंभ…
अर्थ मन‑वचन‑काया से हमने जो हिंसक या पाप वाले कार्य शुरू किए, करवाए या देखकर खुश हुए, और क्रोध, मान, माया, लोभ के वश होकर जो भी किया – वह सब हमारा पाप है।
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5. शत आठ जु इमि भेदन तैं…
अर्थ हमने असंख्य प्राणियों को तरह‑तरह से चोट पहुँचाई, काटा, मारा, बाँधा इत्यादि। इन पापों की पूरी कहानी तो हम कह भी नहीं सकते, परंतु आप सर्वज्ञ भगवान तो सब जानते ही हैं।
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6. विपरीत एकांत विनय के…
अर्थ हमने सही विनय के विपरीत आचरण किया, संदेह, अज्ञान और बुरे गुणों के वश होकर हमने अनेक पाप किए, जो शब्दों में भी पूरे नहीं कहे जा सकते।
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7. कुगुरुन की सेवा कीनी…
अर्थ हमने कुगुरु (गलत मार्ग बताने वाले गुरु) की भी सेवा की, उनकी बातों से मिथ्यात्व (गलत श्रद्धा) में पड़कर चारों गति में दुःख देने वाले दोष बँधवाए – यह भी हमारा अपराध है।
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8. हिंसा पुनि झूठ जु चोरी…
अर्थ हमने हिंसा की, झूठ बोला, चोरी की, पर‑स्त्री/पर‑पुरुष पर वासनापूर्ण दृष्टि डाली, आरंभ और परिग्रह (अनावश्यक संग्रह) से भरे पाप किए – यह सब हम स्वीकार करते हैं।
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9. सपरस रसना घ्राननको…
अर्थ हमने स्पर्श, रसना (जिह्वा), नाक, आँख, कान – इन इन्द्रियों से बहुत‑से मनमाने कर्म किए, न्याय–अन्याय (सही‑गलत) की परवाह किए बिना।
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10. फल पंच उदम्बर खाये…
अर्थ हमने पंचोदुम्बर फल (बहु जीवधारी फल) खाए, मन से मांस, मदिरा आदि की इच्छा की, आठ मूलगुण भी ठीक से नहीं रखे। ये सब बड़े दोष हैं, जो बहुत दुख देने वाले हैं।
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11. दुइबीस अभख जिन गाये…
अर्थ जिन भगवान ने जो २२ प्रकार के “अभक्ष्य” (न खाए जाने योग्य पदार्थ) बताए, उन्हें भी हम रोज खाते रहे, उनमें भेद–अभेद का विवेक नहीं रखा, सिर्फ पेट भरने के लिए जो मिला खा लिया – यह भी पाप है।
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12. अनंतानु जु बंधी जानो…
अर्थ हमने अनन्तानुबंधी, प्रत्याख्यान, अप्रत्याख्यान, संज्वलन – ऐसे अनेक प्रकार के कर्मों का बंध किया। उनके १६ भेद बताए गए हैं – वे सब हमने बाँधे हैं, ऐसा मानते हैं।
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13. परिहास अरति रति शोग…
अर्थ हमने परिहास (गलत मज़ाक), अरति (धर्म में अरुचि), रति (अधर्म में रुचि), शोक, भय, ग्लानि इत्यादि, और त्रिविध वेदना (दुःख) वाले २३ संयोगों के वश होकर बहुत पाप किए – यह स्वीकार करते हैं।
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14. निद्रावश शयन कराई…
अर्थ नींद के वश होकर सोते समय भी हमने दोष किए, स्वप्न में भी पाप के भाव आए; जागने के बाद भी विषय‑वन (इन्द्रिय सुखों के जंगल) में दौड़े और अनेक विषम फल (अशुभ कर्म) खाए।
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15. आहार विहार निहारा…
अर्थ हमने अपने आहार‑विहार (खाना‑पीना, चलना‑फिरना) को ठीक से नहीं देखा‑परखा, जो वस्तु दिखी उसे बिना जाँचे उठा ली, बिना खोजे‑परखे खा ली – यह भी प्रमादजन्य पाप है।
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16. तब ही परमाद सतायो…
अर्थ ऐसे‑ऐसे प्रमाद (लापरवाही) ने हमें घेर लिया, मन में अनेक गलत विचार उठे, सद्बुद्धि चली गई, मिथ्या‑मत (गलत दृष्टि) ने हमें ढँक लिया – यह हमारी भूल है।
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17. मरजादा तुम ढिंग लीनी…
अर्थ हे प्रभु! हमने आपके धर्म की मर्यादाएँ (व्रत, नियम) ग्रहण तो कीं, पर उनमें भी अनेक दोष कर दिए। उन्हें अलग‑अलग कैसे गिनाएँ? आप तो सर्वज्ञानी हैं, सब जानते हैं।
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18. हा हा! मैं दुठ अपराधी…
अर्थ अरे! मैं बहुत बड़ा अपराधी हूँ, त्रस जीव (चलने‑फिरने वाले जीव) की हानि करने वाला हूँ, स्थावर जीवों पर दया नहीं की, अपने हृदय में करुणा नहीं जगाई – यह मेरा भारी दोष है।
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19. पृथिवी बहु खोद कराई…
अर्थ हमने ज़मीन बहुत खोदी, महल आदि बड़े भवन बनवाए, बिना सोचे‑समझे जल बहाया, पंखों से हवा झलवाई – इन सब में अनेकों जीवों की हिंसा हो गई।
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20. हा हा! मैं अदयाचारी…
अर्थ मैं दयाहीन हूँ, मैंने बहुत हरितकाय (वनस्पति आदि) को काटा, उनमें निहित जीवों के टुकड़े‑टुकड़े हो गए, और मैं उन्हें खाकर आनंद लेता रहा – यह मेरा अपराध है।
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21. हा हा! परमाद बसाई…
अर्थ प्रमादवश बिना देखे ही अग्नि जलाई, उसमें जो जीव आए, वे सब मरकर परलोक सिधार गए – उनकी हिंसा का दोष भी मेरे ऊपर है।
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22. बींध्यो अन राति पिसायो…
अर्थ हमने ईंधन, लकड़ी आदि बिना जाँचे काटे, जलाए, पीसे, झाड़ू से जगह‑जगह बुहारा, जिससे अनगिनत चींटियाँ और छोटे जीव मर गए – यह सब पाप है।
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23. जल छानि जिवानी कीनी…
अर्थ कभी‑कभी तो छाना हुआ जल भी (जिसमें जीव अलग हुए हों) फेंक दिया, उसे जल‑स्थान (जल‑स्थापन) तक पहुँचाया नहीं; ऐसी लापरवाही से भी हमने पाप अर्जित किए।
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24. जलमल मोरिन गिरवायो…
अर्थ हमने गंदा पानी, मल‑मूत्र आदि बहाकर, अनेक कीट‑कुल की हिंसा कराई, नदी‑नालों में कपड़े धोकर, कौसों तक फैले जीवों की हत्या कराई – यह भी हमारा अपराध है।
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25. अन्नादिक शोध कराई…
अर्थ अन्न आदि को जब छाना‑छाना, उसमें से निकले हुए जीवों को भी हमने सही तरह से नहीं बचाया, उन्हें धूप, हवा, गलियारों में छोड़कर मरवा दिया – यह भी दोष है।
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26. पुनि द्रव्य कमावन काजे…
अर्थ धन‑दौलत कमाने के लिए हमने बहुत‑से आरंभ और हिंसा के साधन बनाए, तृष्णा (लालच) के कारण भारी‑भारी पाप किए, करुणा को ज़रा भी स्थान नहीं दिया – यह भी पाप है।
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27. इत्यादिक पाप अनंता…
अर्थ हे भगवान! ऐसे अनंत प्रकार के पाप हमने किए हैं, जो बहुत लंबे समय से चलते आ रहे हैं, जिन्हें वाणी से पूरा‑पूरा कहना संभव ही नहीं।
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28. ताको जु उदय अब आयो…
अर्थ अब उन पापों का उदय आया है, विभिन्न प्रकार के दुख हमें सताते हैं, उनका फल भोगते‑भोगते आत्मा दुखी हो रही है – इसे शब्दों में कहना भी कठिन है।
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29. तुम जानत केवलज्ञानी…
अर्थ हे केवलज्ञानी भगवान! आप सब जानते हैं, आप ही हमारी पीड़ा दूर कर सकते हैं, हम तो आपकी शरण में आए हैं – आप तो सबको तारने वाले हैं।
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30–31–32: भगवान की शरण, कृपा की प्रार्थना
संक्षिप्त अर्थ जैसे आपने द्रौपदी की लाज बचाई, सीता पर कमल वर्षाए, अंजन चोर को भी पाप से हटाया – ऐसे ही हमारे दोष भी न देखें, अपनी करुणा के स्वभाव से हमारे दुख दूर करें। हम आपके चरणों की शरण में हैं।
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33. इंद्रादिक पद नहिं चाहूँ…
अर्थ मुझे इंद्र आदि स्वर्ग के बड़े पद नहीं चाहिए, इन्द्रिय विषयों में भी मेरी रुचि न रहे, मेरा राग‑द्वेष आदि दोष नष्ट हो जाएँ, और मुझे अपना शुद्ध आत्म‑पद (मोक्षमार्ग की सिद्धि) प्रदान हो – यह मेरी प्रार्थना है।
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दोहा ३४–३५: अंतिम प्रार्थना
अर्थ (सार) हे दोष‑रहित जिनदेव! मुझे अपना निज‑पद (आत्मज्ञान, सम्यक् श्रद्धा‑ज्ञान‑चारित्र) दीजिए, ताकि सब जीवों का कल्याण हो, सुख और आनंद बढ़े। हे जिनदेव, आप तो पारखी जौहरी की तरह आत्मरत्न के ज्ञाता हैं, मुझे आपके चरणों की शरण और आनंदमयी स्थिति ही प्रभु‑वर रूप में मिल जाए।
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इस प्रकार “आलोचना पाठ” का मूल भाव यह है: अपने द्वारा हुए हर प्रकार के हिंसा‑पाप को विनम्रता से स्वीकार करना, उन पर गहरा पश्चात्ताप करना, और जिन भगवान की शरण में रहकर आगे से उन्हें न दोहराने का निश्चय करना।