How jain Sadhvis do pakhana
“Pakhाना” तो हर इंसान की नैसर्गिक ज़रूरत है, सadhvi भी इस नियम से अलग नहीं हैं। फर्क सिर्फ़ इतना है कि वे इसे भी शुद्धि, लज्जा और अहिंसा के नियमों के साथ करती हैं।
बहुत सरल तरीके से समझें:
- साध्वी भी सामान्य ही शौच करती हैं
- शरीर वाला हर जीव भूख, नींद, प्यास और शौच से बंधा है। - सadhvi इनसे भागती नहीं, बस इन्हें संयम और सावधानी (अप्रमत्तता) से निभाती हैं।
- अहिंसा और शुद्धि का ध्यान
- जैन साधु–साध्वी के पाँच समिति में से एक है उत्सर्ग समिति – मतलब “शौच आदि करते समय जीवों की रक्षा और सावधानी”। - वे ध्यान रखती हैं कि: - ज़मीन पर या शौचालय में अनावश्यक गंदगी न फैले, - कम से कम जीवों की हिंसा हो, - पानी का दुरुपयोग न हो।
- लज्जा (शर्म) और मर्यादा
- पूरी तरह एकांत और परदे में जाती हैं। - शरीर को ढँक कर रखती हैं; कोई अशोभनीय खुलापन नहीं होता। - चलते–फिरते या खुले में ऐसे नहीं बैठतीं कि किसी की दृष्टि में आएँ; हमेशा मर्यादा का ध्यान रखती हैं।
- साधन और सफ़ाई
- परंपरागत रूप से साधु के लिए कमंडल / लोटा का उल्लेख आता है, जिससे पानी लेकर शौच के बाद शुद्धि करते हैं; सadhvi भी अपनी परंपरा के अनुसार इसी तरह की व्यवस्था रखती हैं। - शौच के बाद अच्छी तरह हाथ–मुँह आदि धोकर फिर ही किसी धार्मिक कार्य (पाठ, पूजा, प्रवचन) में लगती हैं।
- पुराने समय और आज का अंतर
- प्राचीन समय में, गाँव–देहात में साधु–साध्वी प्रायः किसी सुनसान स्थान पर जाते थे, जैसे सामान्य लोग खेत–खलिहान में जाते थे, पर ज्यादा सावधानी और स्वच्छता से। - आजकल जहाँ जैन उपाश्रय, धर्मशाला या साध्वी–आवास हैं, वहाँ प्रायः अलग स्वच्छ शौचालय की व्यवस्था की जाती है, ताकि: - वे भी मर्यादा से रह सकें, - और जीव–हिंसा व गंदगी कम से कम हो।
- शास्त्रीय दृष्टि से
- उनके लिए “महाव्रत” (अहिंसा, सत्य, अचौर्य, ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह) के साथ-साथ समितियाँ और गुptियाँ बहुत महत्त्व की हैं। - शौच–कर्म में वे यह ध्यान रखती हैं कि: - मन से: कोई घृणा, क्रोध, लापरवाही न आए, - वचन से: कोई अशोभनीय बातें न हों, - काय से: जल्दबाज़ी या गंदगी से किसी को कष्ट न पहुँचे।
सार में: जैन साध्वी भी सामान्य मनुष्यों की तरह ही पखाना करती हैं, लेकिन बहुत अधिक लज्जा, सफ़ाई, कम जीव–हिंसा और आध्यात्मिक सावधानी के साथ।
साध्वीजी की दिनचर्या के बारे में थोड़ा विस्तार से आप यहाँ पढ़ सकते हैं: