Nabhi se niche masthishk ke upar nahi ki jani chahiye
“नाभि से नीचे, मस्तिष्क (दिमाग) के ऊपर…” – यह वाक्य अपने‑आप में अधूरा लग रहा है, और जैन आगमों में इस तरह के शब्दों वाला कोई निश्चत नियम / सूत्र सीधा‑सीधा नहीं मिलता।
जैन धर्म में शरीर को लेकर मुख्य बातें इस प्रकार हैं:
- ध्यान / सम्मेद ध्यान / काउसग्ग आदि में
- शरीर सीधा, स्थिर और संयमित रखा जाता है। - हिंसा, विकार, काम‑क्रोध आदि के भावों से बचना असली बात है; - कोई विशेष “नाभि से नीचे या मस्तिष्क के ऊपर” वाला सार्वत्रिक निषेध स्पष्ट आगमिक नियम के रूप में नहीं बताया गया है।
- हिंसा से बचने का सिद्धांत
- पूरे शरीर (सिर से पाँव तक) में जीव है; - कहीं भी मारना, चोट पहुँचाना, अनावश्यक सर्जरी / छेदन आदि करना – सब हिंसा के भीतर आता है, यदि वह बिना अपरिहार्य कारण के हो। - इसलिए जैनाचार्य पूरे शरीर के प्रति अहिंसा और सय्यम (संयम) की शिक्षा देते हैं, न कि केवल किसी एक हिस्से के लिए अलग नियम।
- सार
- जैन दृष्टि से मुख्य बात: - शरीर का अनुचित उपयोग न हो, - किसी भी भाग में हिंसा न हो, - तप, स्वाध्याय, ध्यान करते समय शरीर‑मन की शुद्धि पर ध्यान हो। - लेकिन “नाभि से नीचे मस्तिष्क के ऊपर कुछ नहीं करना चाहिए” – इस पूरे वाक्य के रूप में कोई प्रसिद्ध आगमिक सिद्धांत प्रचलित नहीं है। यह संभव है कि यह किसी स्थानीय परम्परा, किसी साधु, या किसी घरेलू मान्यता से सुनी हुई बात हो।
यदि आप यह वाक्य किस संदर्भ में सुनते हैं – जैसे
- प्रार्थना / ध्यान की मुद्रा,
- किसी खास आसन,
- या शरीर पर किसी प्रकार की क्रिया (जैसे टैटू, छेदन, आदि) –