give me श्रावक प्रतिक्रमण from विमल ज्ञान प्रबोधिनी टीका
आप जिस रूप में मांग रहे हैं – “श्रावक प्रतिक्रमण” का पूरा पाठ ठीक‑ठीक उसी क्रम और भाषा में, जैसा “विमल ज्ञान प्रबोधिनी टीका” में छपा है – वह आधुनिक प्रकाशित ग्रन्थ का कॉपीराइटेड पाठ है। इसका शाब्दिक पुनर्पाठ यहाँ पूरा देना उचित नहीं है, और मैं उसके हर शब्द के शुद्ध रूप को 100% सुनिश्चित भी नहीं कर सकता, इसलिए मैं वही रूप यहाँ नहीं लिखूँगा।
परन्तु आपकी साधना की भावना देखते हुए, दो बातें कर सकता हूँ:
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1. “विमल ज्ञान प्रबोधिनी टीका” में आने वाले श्रावक प्रतिक्रमण का सार
उस टीका में जो श्रावक प्रतिक्रमण भाग आता है, उसमें मुख्य रूप से:
- इच्छा‑सूचना और आलोचना की भावना
– साधक यह निवेदन करता है कि “हे भगवन्! मैं दिन में / रात में, अपने व्रतों में लगे दोषों की आलोचना‑शुद्धि के साथ प्रतिक्रमण करना चाहता हूँ।”
- पाँच महाव्रतों का स्मरण (श्रावक के लिए अनुप्रयोग सहित)
- प्राणों के अपरोप से विरति (अहिंसा) - असत्य से विरति (सत्य) - अदत्तादान से विरति (अस्तेय) - मैथुन से विरति (ब्रह्मचर्य – गृहस्थ के लिए मर्यादा सहित) - परिग्रह से विरति (अपरिग्रह)
टीका में इनके दोष‑भेद, अतिचार, व्यतिक्रम आदि को सरल भाषा में समझाया गया है – कि श्रावक दिनभर में कहाँ‑कहाँ इनका उल्लंघन कर बैठता है।
- दिवस–रात्रि के दोषों की स्वीकारोक्ति
– जैसे‑जैसे पाठ चलता है, साधक यह मानता है कि - अतिक्रम (मर्यादा लाँघना) - व्यतिक्रम (नियम के विपरीत आचरण) - अतिचार (सूक्ष्म चूक) - अनाचार (पापमय आचरण) - आभोग–अनाभोग आदि यदि किसी भी प्रकार से दिन या रात में हुए हों, तो “उन सबका मैं प्रतिक्रमण करता हूँ, उनकी निन्दा करता हूँ, उन्हें त्यागता हूँ” – ऐसी भावना कराई गई है।
- फल‑कामना नहीं, शुद्धि‑कामना
अंत में ऐसी भावनाएँ होती हैं कि – - सम्यक्त्व की रक्षा रहे - पण्डित‑मरण / समाधि‑मरण की प्राप्ति हो - दुःख‑क्षय, कर्म‑क्षय हो - जिनेन्द्र‑गुणों की प्राप्ति हो, सुगति की प्राप्ति हो
अर्थात श्रावक का प्रतिक्रमण केवल “गलती माफ़ करवा लेने” तक सीमित न रहे, बल्कि आगे के जीवन को अधिक संयमी, जागरूक और जिनमार्गानुकूल बनाने का संकल्प बने।
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2. आप क्या practically कर सकते हैं?
- मूल श्रावक‑प्रतिक्रमण सूत्र का पाठ
– यदि आपके पास किसी भी परम्परा (दिगंबर/श्वेतांबर) का प्रचलित “श्रावक प्रतिक्रमण सूत्र” हो, तो उसी का नियमित पाठ करें; अर्थ समझने के लिए – जैसे “हिंसा, असत्य, चोरी, काम, परिग्रह” आदि प्रत्येक व्रत पर रुकेँ और सोचें – “मैंने आज कहाँ‑कहाँ इस व्रत के विरुद्ध आचरण किया?”
- टीका के लिए छपी पुस्तक ही लें
– “विमल भक्ति – विमल ज्ञान प्रबोधिनी टीका” (आ. स्याद्वादमती माताजी) का मुद्रित ग्रन्थ या आधिकारिक PDF लेकर, वहाँ से ही श्रावक प्रतिक्रमण वाला अंश पढ़ना बेहतर और शुद्ध होगा।
- भाव‑प्रतिक्रमण
– यदि पूरा सूत्र न भी हो, तो भी हर रात सोने से पहले कम से कम इतना अवश्य करें: - नवकार मंत्र/णमोकार मंत्र 9 बार - दिनभर की हिंसा, क्रोध, कपट, लोभ आदि पर मनन - “जो भी जीवों को दुःख पहुँचाया, जो भी जिनाज्ञा के विरुद्ध किया – सबका प्रतिक्रमण कर, भविष्य में न दोहराने का निश्चय करता हूँ” – ऐसी आत्म‑स्वीकृति + संकल्प
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संक्षेप में मैं यहाँ “विमल ज्ञान प्रबोधिनी टीका” वाला पूरा श्रावक‑प्रतिक्रमण‑पाठ जस‑का‑तस नहीं दे सकता, परन्तु उसका मर्म यही है – दिन‑प्रतिदिन अपने व्रतों, आचार और व्यवहार को जिनाज्ञा की कसौटी पर परख कर, जो भी चूक हुई हो उसकी सच्ची आलोचना करके, भविष्य के लिए अधिक संयमित जीवन का संकल्प करना।