okay, you can give me this slok उत्तम मज्झ जहण्णं, तिविहं पोसहविहाण
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यह पंक्ति जैन श्रावकाचार–ग्रंथों (जैसे वसुनन्दि श्रावकाचार) में “प्रोषध‑प्रतिमा” के प्रसंग में आती है। मूल वाक्यांश है:
“उत्तम मज्झ जहण्णं, तिविहं पोसहविहाणं”
सरल अर्थ:
- उत्तम – श्रेष्ठ
- मज्झ (मध्य) – मध्यम
- जहण्णं – जघन्य (सबसे नीचा / कम)
- तिविहं – तीन प्रकार का
- पोसहविहाणं – पोषध‑विधान (प्रोषध व्रत करने का तरीका)
पूरा भावार्थ:
> प्रोषध (पोसह) व्रत का विधान तीन प्रकार का कहा गया है – > (1) उत्तम (सबसे श्रेष्ठ), > (2) मध्यम और > (3) जघन्य (न्यून / साधारण), > जो गृहस्थ अपनी शक्ति के अनुसार इन तीनों में से जैसा संभव हो, वैसा अपनाए।
यानि, शास्त्र यह बता रहा है कि श्रावक के लिए पोषध‑व्रत एक ही रूप में अनिवार्य नहीं है, बल्कि क्षमता और सामर्थ्य के अनुसार उसके तीन स्तर माने गए हैं – सबसे ऊँचा (पूरी कड़ाई और शुद्धि के साथ), बीच का, और न्यून (कम कठोर नियमों के साथ)।