जैन आगम में “एक मात्र कर्म जो सबसे बेस्ट है”
जैन आगमों में “सबसे बेस्ट / एक मात्र” ऐसा कोई शब्दशः वाक्य नहीं है, लेकिन पूरे आगम का सार देखने पर यह स्पष्ट है कि
अहिंसा (प्राणी‑मात्र के प्रति पूर्ण दया और अनुकम्पा) को ही सर्वोच्च धर्म माना गया है।
अर्थ यह हुआ –
- किसी को तन से, वचन से, या मन से भी चोट न पहुँचाना
- जहाँ तक हो सके, सब जीवों के दुःख को कम करना
- लोभ, क्रोध, मान, माया जैसे कषायों से बचकर चलना
इसीलिए आचार्य कहते हैं कि
- दान, पूजा, व्रत, तप, स्वाध्याय – सब अच्छे हैं,
साथ ही दार्शनिक दृष्टि से जैन धर्म में मूल साधन सम्यक दर्शन को माना गया है, पर व्यवहारिक आचरण में अहिंसा को ही सबसे ऊँचा कर्म / धर्म कहा गया है।