क्या nirjara karma sabse best mana jata hai in jain agam
जैन आगमों में नव‑तत्त्व में से निर्जरा (कर्मों का क्षय/झड़ना) एक बहुत महत्त्वपूर्ण तत्त्व है, लेकिन इसे अकेले “सबसे बेस्ट” या “सबसे बड़ा” नहीं कहा गया है।
संक्षेप में समझिए:
- नव‑तत्त्व क्रम
जीव, अजीव, पुण्य, पाप, आस्रव, बन्ध, संवर, निर्जरा, मोक्ष – इसमें मोक्ष अंतिम लक्ष्य है। – संवर और निर्जरा – दोनों मिलकर कर्मबंधन को घटाते हैं।
- क्या सिर्फ निर्जरा ही सर्वोत्तम है?
- आगमों में यह नहीं कहा गया कि “बाकी सब छोड़कर केवल निर्जरा ही महान है।” - बल्कि बताया है कि - संवर से नये कर्मों का प्रवेश रुकता है, - निर्जरा से पुराने बंधे कर्म झड़ते हैं, - और इन दोनों के पूर्ण होने पर मोक्ष मिलता है। - इसलिए आगमिक दृष्टि से “केवल निर्जरा” नहीं, बल्कि सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान, सम्यक्चरित्र, संवर और निर्जरा – सब मिलकर मार्ग को सर्वोत्तम बनाते हैं।
- फिर निर्जरा का विशेष महत्त्व क्यों माना जाता है?
- क्योंकि बिना निर्जरा के कर्म‑बंधन कभी समाप्त ही नहीं होगा। - धर्माध्यान, शुभ ध्यान, तप, व्रत आदि को अक्सर “निर्जरा‑प्रधान” साधन कहा जाता है, इसलिए व्यवहार में लोग कहते हैं कि निर्जरा बहुत ऊँची साधना है। - पर सिद्धांत रूप से यह नव‑तत्त्वों की पूरी श्रृंखला का एक अनिवार्य हिस्सा है, अकेला ‘सर्वोत्तम’ घोषित तत्त्व नहीं।
- दिगम्बर–श्वेताम्बर दोनों में
- दोनों परम्पराओं में नव‑तत्त्व की परिभाषा में निर्जरा = कर्मों का क्षय/झड़ना ही है। - दोनों मानते हैं कि मोक्ष के लिए संवर + निर्जरा दोनों आवश्यक हैं; यहाँ मतभेद का कोई विशेष प्रश्न नहीं है।
अगर आप यह सुनते हैं कि “निर्जरा कर्म ही सबसे बड़ा है”, तो उसे ऐसे समझना सुरक्षित है कि – कर्म‑क्षय के बिना मोक्ष नहीं, इसलिए निर्जरा अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है; पर आगम की दृष्टि से यह अन्य तत्त्वों के साथ मिलकर ही पूर्ण मार्ग बनाती है।
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