first chapter, 8th Udeshyak, it says ‘Shaileshi labdhivirya se savirya hei, aur karanvirya se avirya hei. And ashaileshi labdhivirya se savirya hei, aur karanvirya se savirya and avirya hei.’ What do you understand by this?-Reference - Bhagawati sutra
आपने जो वाक्य लिखा है, वह वीर्य (आत्मिक शक्ति) के भेद – लाभ्दि-वीर्य और कारण-वीर्य, तथा शैलेषी और अशैलेषी अवस्थाओं के सम्बन्ध में है। इसे बहुत सरल भाषा में समझें:
मुख्य शब्द पहले समझें
- वीर्य
- आत्मा की प्रयत्न-शक्ति / उद्योग-शक्ति – साधना करने, उपादान बदलने की शक्ति।
- लाभ्दि-वीर्य
- जो उपलब्ध (actual, present) शक्ति है, जो अभी-अभी प्रयोग में आ सकती है। - जैसे – आपके पास अभी जितना स्टैमिना है, उतना तुरंत दौड़ सकते हैं – यह लाभ्दि है।
- कारण-वीर्य
- जो कारण रूप से निहित शक्ति है – क्षमता तो है, पर अभी पूरी तरह जागृत / उपयोग में नहीं आई, या कुछ कारणों से रुक सकती है। - जैसे – शरीर में क्षमता बहुत है, पर बीमारी, बन्धन, परिस्थिति के कारण सब उपयोग में नहीं आ पाता।
- शैलेषी अवस्था
- अत्यंत स्थिर, हिमालय (शैल) के समान निश्चल अवस्था – - इसमें साधक/सिद्ध उद्योगहीन नहीं, परन्तु प्रयत्न का स्वभाव ही ऐसा हो जाता है कि नया कर्म नहीं बाँधता; अत्यन्त शान्त, निष्कम्प चैतन्य की दशा।
- अशैलेषी अवस्था
- जहाँ अभी चेष्टा, उद्योग, परिवर्तन, साधना आदि स्पष्ट दिखती है – - प्रवृत्ति, संयम, तप, साधना, उपदेश, स्पन्दन आदि चल रहे हैं।
- सवीर्य
- जहाँ वीर्य (प्रयत्न-शक्ति) का वास्तविक उपयोग हो रहा है – - यानी वहाँ “करने की शक्ति” सक्रिय है।
- अवीर्य
- जहाँ बाह्य दृष्टि से या परिणाम की दृष्टि से कोई सक्रिय प्रयत्न नहीं दिखता, अथवा प्रयत्न की शक्ति परिणाम में अप्रकट है। - क्षमता latent रह सकती है, पर current expression नहीं।
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अब आपके वाक्य को चरण-दर-चरण समझें
1. “शैलेषी लाभ्दि-वीर्य से सवीर्य है, और कारण-वीर्य से अवीर्य है।”
- “शैलेषी लाभ्दि-वीर्य से सवीर्य”
- “कारण-वीर्य से अवीर्य”
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2. “अशैलेषी लाभ्दि-वीर्य से सवीर्य है, और कारण-वीर्य से सवीर्य और अवीर्य है।”
- “अशैलेषी लाभ्दि-वीर्य से सवीर्य”
- “कारण-वीर्य से सवीर्य और अवीर्य” – दोनों
- इसीलिए कहा – अशैलेषी कारण-वीर्य से कभी सवीर्य, कभी अवीर्य – - परिस्थिति और परिणाम के अनुसार दोनों प्रकार का नय-वचन सम्भव है। - द्रव्य नय / परिणाम नय आदि से भिन्न-भिन्न वर्णन सम्भव हैं – - द्रव्य से देखें तो कारण-वीर्य है → सवीर्य, - कुछ विशेष परिणाम-स्थिति में देखें तो उसका फल अभी प्रकट नहीं → अवीर्य।
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सारांश – जैन दार्शनिक दृष्टि से
- शैलेषी अवस्था
- आत्मा की अत्यंत निश्चल, निर्मल, शान्त दशा। - लाभ्दि-वीर्य की दृष्टि से: पूरी शक्ति विद्यमान → इसलिए सवीर्य। - कारण-वीर्य की दृष्टि से: अब कोई कर्म-कारी, संसार-उत्पादक प्रयत्न नहीं → इसीलिए अवीर्य कही जाती है।
- अशैलेषी अवस्था
- जहाँ अभी प्रवृत्ति, साधना, उद्योग, चेष्टा स्पष्ट है। - लाभ्दि-वीर्य से: सदैव सवीर्य – क्योंकि जो शक्ति प्राप्त है, उससे प्रयत्न होता है। - कारण-वीर्य से: - कुछ दृष्टि / स्थिति में → सवीर्य (क्योंकि वही नये परिणाम, साधना, कर्म-बंधन का कारण है), - कुछ दृष्टि / स्थिति में → अवीर्य (जब उसका परिणाम-रूप प्रकट या कार्यशील नहीं माना जाता)।
इस प्रकार यह वचन जैन नय-बहुलता (अनेकान्त) के अनुसार, एक ही आत्मा-अवस्था को अलग-अलग दृष्टि से सवीर्य और अवीर्य दोनों कहने की सूक्ष्मता समझाता है – और बताता है कि शैलेषी में शक्ति रहते हुए भी संसार-कारी उद्योग नहीं रहता, जबकि अशैलेषी में दोनो प्रकार के वर्णन सम्भव हैं।