Kya अनित्य भावना आज उपयोगी और कल रद्दी मानी जाती हैं in jainism
नहीं, “अनित्य भावना” (अनिच्च भavana) ऐसा कुछ नहीं है जो आज उपयोगी और कल रद्दी (बेकार) हो जाए। जैन धर्म में यह हमेशा उपयोगी, प्रासंगिक और अत्यन्त महत्वपूर्ण साधना मानी गई है।
1. अनित्य भावना क्या है?
अनित्य भावना का सरल अर्थ है – “यह सब नश्वर है, स्थायी नहीं है” – देह, धन, पद, सम्बन्ध, सुख‑दुःख, शरीर, घर, परिवार, राज्य, सत्ता – कुछ भी सदा के लिए नहीं है।यह भावना हमें बार‑बार याद दिलाती है कि:
- जो मिला है, वह एक दिन छिन जाएगा
- शरीर नश्वर है
- संसार परिवर्तनशील है
- केवल आत्मा (जीव) ही वास्तव में सिद्ध अवस्था में जाकर नित्य सुख पाती है
2. इसका उद्देश्य क्या है?
अनित्य भावना का उद्देश्य है:- अधिक आसक्ति (जबर्दस्त चिपकाव) कम करना
- क्रोध, मान, माया, लोभ को कम करना
- मृत्यु, हानि, बीमारी आदि के समय धैर्य देना
- संसार से विरक्ति और आत्मा की ओर रुचि बढ़ाना
इससे मन में वैराग्य आता है – “जब सब नाशवान है तो पाप करके क्या मिलेगा?” – ऐसा विवेक जगता है।
3. “आज उपयोगी, कल रद्दी” – यह धारणा गलत क्यों है?
कुछ लोग ऐसे सोच सकते हैं:- “आज के practical जीवन में यह भावनाएँ पुरानी हो गई हैं।”
- “आज के जमाने में वैराग्य, अनित्य आदि की क्या ज़रूरत?”
पर जैन दृष्टि से:
- जन्म‑मरण आज भी हो रहा है, जैसा पहले होता था।
- मोह, लोभ, क्रोध आज भी उतने ही हैं, बल्कि कई बार ज़्यादा हैं।
- दुख, तनाव, टेंशन आज कम नहीं, ज़्यादा हैं।
तो जो साधना:
- मोह कम करे
- तनाव कम करे
- मृत्यु‑भय घटाए
- भीतर स्थिरता दे
वह आज के युग में और भी ज़्यादा ज़रूरी है, रद्दी नहीं।
4. क्या यह केवल पुराने जमाने की थी?
नहीं। अनित्य भावना:- आगमों में भावनाओं की सूची में आती है
- आचार्यों ने उसे नित्य चिंतन के रूप में बताया है
- दिगंबर‑श्वेतांबर दोनों परम्पराओं में स्वीकार्य है (भाषा/सूची में थोड़ा अंतर हो सकता है, पर सिद्धान्त समान है)
समय बदलता है,
- पर कर्म सिद्धान्त नहीं बदलता
- मृत्यु का सत्य नहीं बदलता
- आसक्ति से उपजने वाला दुःख नहीं बदलता
इसलिए अनित्य भावना कभी “outdated” या “रद्दी” नहीं हो सकती।
5. आज के जीवन में इसका सीधा उपयोग कैसे है?
आज भी अनित्य भावना से:- व्यापार में नुक़सान हो तो मन संभल सकता है – “यह भी अनित्य है”
- शरीर की बीमारी में – “शरीर नश्वर है, पर मैं केवल शरीर नहीं हूँ”
- रिश्तों के बदलने में – “संसार का हर सम्बन्ध अनित्य है, अतः अत्यधिक मोह से बचना है”
- अचानक मृत्यु के प्रसंगों में – “मृत्यु स्वाभाविक है, यह कोई अन्याय नहीं, यह संसार का नियम है”
इससे:
- depression, extreme attachment, अत्यधिक ग़म इत्यादि से बचाव होता है
- भीतर शांति और स्वीकार का भाव आता है
---
निष्कर्ष: जैन धर्म में अनित्य भावना आज भी उतनी ही प्रासंगिक है जितनी पहले थी। यह कोई “पुरानी या रद्दी” चीज़ नहीं, बल्कि:
- मोक्ष‑मार्ग की साधना
- और आज के तेज, तनावपूर्ण जीवन में भी एक बहुत गहरी मानसिक‑आध्यात्मिक सहायता है।