Padmaprabu anandganji stavan lyrics n it's meaning
नीचे “श्री पद्मप्रभ जिन स्तवन” (आचार्य उपाध्याय श्री आनंदघनजी कृत – आनंदघन चौबीसी में से) का मूल पाठ और सरल अर्थ दिया है।
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मूल स्तवन (Devanagari)
श्री पद्मप्रभ जिन स्तवन (राग – मारू / सिन्धु)
- पदमप्रभु जिन तुज मुझ आंतरौ, किम भांजै भगवन्त।
करम विपाके कारण जोइने, कोई कहै मतिवन्त॥ पदम० ॥१॥
- पयइ ठिई अणुभाग प्रदेशथी, मूल उत्तर बहु भेद।
घाती अघाती बंधोदयोदोरणा, सत्ता करम विछेद॥ पदम० ॥२॥
- कनकोपलवत पयडी पुरुष तणी, जोड़ि अनादि सुभाय।
अन्य संजोगी जहँ लगी आतमा, संसारी कहवाय॥ पदम० ॥३॥
- कारण जोगे बांधे बंधने, कारण मुगति मुकाय।
आश्रव संवर नाम अनुक्रमे, हेयोपादेय सुणाय॥ पदम० ॥४॥
- जुजन करणे अंतर तुझ पड्यो, गुण करणे करि भंग।
ग्रन्थ उक्ति करि पंडित जन कह्यो, अन्तर भंग सुअंग॥ पदम० ॥५॥
- तुझ मुझ अन्तर अन्तए भांजसे, बाजस्यै मंगल तूर।
जीव सरोवर अतिशय वाधिस्ये, ‘आनन्दघन’ रस पूर॥ पदम० ॥६॥
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सरल भावार्थ (साधारण हिन्दी में)
यह पूरा स्तवन “अन्तरात्मा की परमात्मा से विनती” है – भक्त आत्मा भगवान पद्मप्रभ से पूछती है: “आप और मेरे बीच जो दूरी है, वह कैसे मिटे?”
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(1) पदमप्रभु जिन तुज मुझ आंतरौ…
शब्दार्थ / भाव: हे पद्मप्रभु जिनेश्वर! आप और मेरे (जीव) के बीच जो “अन्तर / दूरी” है, वह कैसे मिटेगी? बुद्धिमान ज्ञानी कहते हैं कि – यह अन्तर मेरे ही कर्मों के विपाक (फल) के कारण है।
सीधा भाव: हमारा और सिद्ध–परमात्मा का स्वभाव तो एक ही (चैतन्य) है, लेकिन बीच में जो फर्क दिख रहा है, वह सब मेरे बंधे हुए कर्मों का परिणाम है।
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(2) पयइ ठिई अणुभाग प्रदेशथी…
यहाँ कर्म के चार भेद (प्रदेश, स्थिति, अनुभाग, प्रकृति) का संकेत है।
सरल अर्थ: आत्मा के सूक्ष्म–सूक्ष्म प्रदेशों में बहुत प्रकार से (मूल, उत्तर – कारण, परिणाम रूप) कर्म बँधते हैं। घाती (ज्ञान–दर्शन आदि को ढँकने वाले) और अघाती (वेदनीय, नाम, गोत्र, आयु) – इन सबका बन्ध, उदय, उदीरणा आदि अवस्थाएँ चलती रहती हैं, फिर समय आने पर उन कर्मों की सत्ता (उपस्थिति) भी नष्ट हो जाती है।
भाव: अन्तर (दूरी) की जड़ कर्म हैं; कर्म भी कितना गहरा विज्ञान है – सूक्ष्म प्रदेशों में अनन्त भेद के साथ बन्ध और छूट होता रहता है।
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(3) कनकोपलवत पयडी पुरुष तणी…
सरल अर्थ: सोने के कणों और पत्थर के टुकड़ों का जैसे स्वाभाविक जुड़ाव (खदान में) अनादि से होता है, वैसे ही आत्मा और पुद्गल (कर्म–द्रव्य) का संयोग भी अनादिकाल से चला आ रहा है। जब तक आत्मा दूसरे–दूसरे संयोगों (शरीर, इन्द्रियाँ, मन आदि) से जुड़ी रहती है, तब तक उसे “संसारी जीव” ही कहा जाता है।
भाव: आत्मा‑कर्म का सम्बन्ध भी सोना–पत्थर जैसे स्वाभाविक संयोग की तरह अनादिकालीन है; इसी से संसार का चक्र चलता है।
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(4) कारण जोगे बांधे बंधने…
यहाँ पाँच कारण – मिथ्यात्व, अविरति, प्रमाद, कषाय, योग और आश्रव–संवर की बात है।
सरल अर्थ: जिन कारणों से कर्मों का बन्ध होता है, उन्हीं कारणों के हटने से मुक्ति भी होती है। इन कारणों से जो कर्म भीतर आते हैं (आश्रव) – वे त्याज्य (हेय) हैं, और जिन कारणों से कर्म का प्रवाह रुकता है (संवर) – वे ग्राह्य (उपादेय) हैं। आचार्य–ग्रंथों में इनका नाम, क्रम और महत्व समझाया गया है।
भाव: अन्तर मिटाने के लिए हमें आश्रव रोकने (संवर) और बंधे हुए कर्म को क्षय करने (निर्जरा) का मार्ग अपनाना है। हेय (त्यागने योग्य) और उपादेय (ग्राह्य) को ठीक से पहचानना पड़ेगा।
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(5) जुजन करणे अंतर तुझ पड्यो…
सरल अर्थ: हे प्रभु! “युक्ति / कारण–जुड़ाव” के कारण आप और मेरे बीच अन्तर पड़ गया है। अब “गुण–करण” (गुण–साधना) से ही उसको तोड़ा जा सकता है। आचार्य–ग्रन्थों में ज्ञानी पण्डितों ने स्पष्ट कहा है कि – यह अन्तर “गुण‑साधना” से ही मिटता है, और इसी में (अन्तर भंग करना) सच्चा सौभाग्य (सुअंग) है।
भाव: कारणों से बने अन्तर को केवल गुण–उपार्जन (सम्यक् दर्शन–ज्ञान–चारित्र आदि की साधना) से मिटाया जा सकता है; यह कोई भावुक कल्पना नहीं, शास्त्रों की ठोस शिक्षा है।
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(6) तुझ मुझ अन्तर अन्तए भांजसे…
सरल अर्थ: जब हमारा यह परस्पर अन्तर अन्त में पूरी तरह मिट जाएगा, तब शुभ मंगल–नाद (देवों की दुन्दुभि) बजेगी। “जीव–सरोवर” (मेरी आत्मा) के चारों ओर इतना सुदृढ़ बाँध बन जाएगा कि उसमें आत्मानन्द की बाढ़ आ जाएगी, और वह पूरा सरोवर आनन्द–रस से भर जाएगा – ऐसा कहकर ‘आनन्दघन’ (स्वयं कवि) अपनी अन्तिम स्थिति का वर्णन करते हैं।
भाव: जब सम्यक् साधना से कर्म का भार पूरी तरह उतर जाएगा, तब आत्मा की झील में केवल चैतन्य–रस की बाढ़ होगी – यही सिद्ध–पद की पूर्ण प्रसन्न अवस्था है।
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संक्षिप्त सार
- यह स्तवन शुद्ध जैन कर्म‑सिद्धान्त पर आधारित है।
- भगवान पद्मप्रभु से विनती है:
- उपाय यही है:
जब ये पाँचों स्तर पर अन्तर मिटता है, तब जीव और सिद्ध–परमात्मा का “अन्तर” केवल नाम–मात्र का रह जाता है – स्वरूप से तो ज्योति में ज्योति जैसा अभेद अनुभव हो जाता है।
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यदि आप चाहें तो मैं इसी स्तवन का बहुत ही संक्षिप्त “लाइन‑दर‑लाइन अर्थ” बच्चों के स्तर पर भी लिख सकता हूँ, या रोमन लिपि (transliteration) में भी दे सकता हूँ।