tell me navanu atichaar
“Navāṇu (99) Atichār” का मतलब है – धर्म पालन में होने वाली 99 तरह की चूक / गलती जो हम रोज़‑मर्रा में कर बैठते हैं, और प्रायश्चित्त के रूप में प्रatikraman में जिनका सामूहिक रूप से क्षमापना की जाती है।
1. ‘Atichār’ का सरल अर्थ
Ati + chār- व्रत, नियम या सही आचरण की मर्यादा से बाहर चले जाना = अतिचार
- जैसे –
ये सब उस व्रत के “अतिचार” कहलाते हैं।
---
2. 99 Atichār कहाँ आते हैं?
Shrāvaka (श्रावक) के प्रतिक्रमण / समायक में एक स्थान पर “निन्यानवे (99) अतिचार” का संकल्प‑रूप में सामूहिक पश्चात्ताप कराया जाता है।
इन 99 अतिचारों में मोटे तौर पर शामिल है –
- दर्शन के अतिचार
- सम्यक दर्शन में चूक – जैसे मिथ्यादर्शन, गलत आस्थाएँ, जैन सिद्धांत पर संदेह आदि।
- ज्ञान के अतिचार
- शास्त्र, आगम, गुरु‑उपदेश के प्रति लापरवाही, मज़ाक, अनादर, या गलत अर्थ लगाना।
- व्रतों के अतिचार
- १२ व्रतों (५ अनुव्रत, ३ गुणव्रत, ४ शिक्षा‑व्रत) को निभाते समय होने वाली छोटी‑बड़ी चूकें - जैसे: - हिंसा‑अनुव्रत के अतिचार (जान-बूझकर/अनजाने में हिंसा) - असत्य, चोरी, कुशील, परिग्रह आदि व्रतों के अलग‑अलग अतिचार
- चारित्र / आचरण के अतिचार
- क्रोध, मान, माया, लोभ, राग‑द्वेष में आकर किया गया पाप - गुरु, साधु, धर्म, मंदिर, ग्रंथ आदि के प्रति अपमानजनक व्यवहार
- तप के अतिचार
- तप करते हुए दिखावा, अहंकार, दूसरों को तंग करना, नियम तोड़ना आदि।
इन सब को मिलाकर जो कुल 99 प्रकार की चूकें मानी जाती हैं, उन्हें “नवाणु अतिचार” कहकर प्रतिक्रमण में एक साथ स्वीकार‑प्रायश्चित्त किया जाता है।
---
3. इन्हें करने का उद्देश्य क्या है?
- यह सूची याद करके गिनती पूरी करना लक्ष्य नहीं,
इससे भीतर लज्जा, नम्रता और सावधानी बढ़ती है – यही प्रायश्चित्त की आत्मा है।
---
4. क्या सबको पूरे 99 याद होने ज़रूरी हैं?
परंपरा में इनकी पूरा विस्तार‑सूची प्रातिक्रमण‑पुस्तकों और श्रावकाचार‑ग्रंथों में दी रहती है, और आचार्य / गुरु भगवंत उसके अनुसार पाठ कराते हैं।
आम गृहस्थ के लिए मुख्य बात है:
- “हर प्रकार की 99 तरह की गलती – जो भी मुझसे हो गई हो –
यही भाव लेकर जब “नवाणु अतिचार” का चिंतन या सामूहिक पाठ होता है, तो उसका फल मिलता है।
---
अगर आपको पूरी सूची ग्रंथानुसार चाहिए, तो बेहतर है कि अपने स्थानीय जैन मंदिर की प्रतिक्रमण‑पुस्तिका / श्रावकाचार ग्रंथ से देखें या किसी विद्वान साधु‑महाराज / ज्ञानवती श्राविका से शास्त्रानुसार लिखित सूची नोट कर लें – ताकि वह आपके परंपरा (श्वेतांबर / दिगंबर, जिस गच्छ या संघ से आप जुड़े हैं) के अनुसार शुद्ध रहे।