Complete details of tat samay ki yogyata
“तत्समय की योग्यता” जैन दर्शन का एक तकनीकी शब्द है, जो निमित्त‑उपादान कारण की चर्चा में आता है। इसे अच्छी तरह समझने के लिए क्रम से देखें:
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1. कारण के दो मुख्य प्रकार – निमित्त और उपादान
जैन दर्शन में किसी भी कार्य (परिणाम) के लिए दो मुख्य कारण बताए जाते हैं:
- उपादान कारण
- जो वस्तु स्वयं रूपांतरित होकर परिणाम बनती है। - जैसे: मिट्टी → घड़ा - मिट्टी ही रूप बदलकर घड़ा बनती है, इसलिए मिट्टी घड़े की उपादान कारण है।
- निमित्त कारण
- बाहर से सहायता करने वाले कारण। - जैसे: कुम्हार, चाक, लाठी, पानी, आग आदि – यह सब निमित्त कारण हैं।
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2. उपादान कारण के 3 प्रकार
जिनस्वरूप की सूक्ष्म विवेचना में उपादान कारण को तीन भागों में बाँटा जाता है:
- त्रिकाली उपादान कारण
- वह द्रव्य जो तीनों काल (भूत, वर्तमान, भविष्य) में बना रहता है - जैसे: घड़े के लिए “मिट्टी‑द्रव्य”; - जीव के लिए – आत्मा‑द्रव्य स्वयं।
- अनन्तर‑पूर्व‑क्षणवर्ती पर्याय रूप उपादान कारण
- परिणाम बनने से ठीक पहले वाले क्षण की अवस्था (पर्याय) - उदाहरण: - पौधा निकलने से ठीक पहले की बीज की अंतिम अवस्था - ज्ञान के उदय से ठीक पहले की जीव की पूर्वज्ञान‑स्थिति
- तत्समय की योग्यता रूप क्षणिक उपादान कारण
- यही वह है जिसके बारे में आपने पूछा है। - यह वही क्षण है जिसमें नया परिणाम प्रकट होता है, और उस क्षण द्रव्य में जो अन्तर्गत योग्यता / सामर्थ्य है, वह तत्समय की योग्यता कहलाती है।
संक्षेप में:
- क्षणिक उपादान कारण के दो नाम माने जाते हैं:
- इसे “समर्थ उपादान कारण” भी कहा जाता है।
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3. “तत्समय की योग्यता” की सरल परिभाषा
परिभाषा (सरल भाषा में): किसी भी नए परिणाम के उसी क्षण द्रव्य में जो आन्तरिक सामर्थ्य या पूर्ण तैयारी (फिटनेस) बन जाती है, जिसके कारण वही विशेष परिणाम अवश्य प्रकट होता है – उस सामर्थ्य को “तत्समय की योग्यता” कहते हैं।
- “तत्समय” = उसी समय / उसी क्षण
- “योग्यता” = पात्रता, सामर्थ्य, क्षमता
अर्थात: > द्रव्य में उसी क्षण उपस्थित ऐसी विशेष आन्तरिक क्षमता, जिससे वह द्रव्य उस समय निश्चित परिणाम देता है – वही तत्समय की योग्यता है।
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4. उदाहरणों से समझें
(क) बीज से पौधा
- बीज जमीन में है, पानी, खाद, धूप भी मिल रही है।
- कई दिनों तक कुछ नहीं निकलता, केवल पूर्व परिणामों की श्रृंखला चलती है।
- जब सारी आन्तरिक स्थितियाँ पूरी तरह पक जाती हैं, ठीक उसी क्षण जब अंकुर बाहर आता है –
तो:
- बीज‑द्रव्य = त्रिकाली उपादान
- अंकुर निकलने से ठीक पहले की बीज‑अवस्था = अनन्तर‑पूर्व क्षणवर्ती पर्याय
- जिस क्षण अंकुर निकला, उसी क्षण की “पूरी योग्यता” = तत्समय की योग्यता
(ख) मिट्टी से घड़ा
- मिट्टी, गूँथना, चाक घुमाना, आग आदि से धीरे‑धीरे रूपांतरण होता है।
- परन्तु एक क्षण ऐसा आता है जहाँ “यह अब घड़ा कहलाएगा” –
(ग) जीव में ज्ञान (मतिज्ञान आदि) का उदय
- जीव ज्ञान‑उदय से पहले अनेक पूर्व परिणामों से गुजरता है।
- शुद्ध‑अशुद्ध भाव, निमित्त, इन्द्रियां, मन आदि की विशेष स्थिति बनती है।
- जब ठीक उसी क्षण ज्ञान का उदय होता है,
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5. यह क्यों महत्वपूर्ण है?
- कर्म‑सिद्धान्त समझने में
- हमारा फल केवल “पहले किए गए कर्म” से नहीं, - बल्कि उस क्षण की आन्तरिक योग्यता से भी जुड़ा है। - जब तक जीव स्वयं के परिणामों द्वारा उस फल को भोगने लायक (योग्य) नहीं हो जाता, - तब तक बाहरी निमित्त रहते हुए भी फल नहीं आता। - फल आता है जब: - उपादान द्रव्य + पूर्व परिणाम + तत्समय की योग्यता + उपयुक्त निमित्त – सब मिल जाते हैं।
- स्वाध्याय और साधना की दृष्टि से
- हम प्रायः कहते हैं – > “जब पुण्य होगा, तभी होगा”, - पर जैन दृष्टि से केवल बाहरी निमित्त या पुण्य‑उदय ही नहीं, - आत्मा की तत्समय की योग्यता भी जरूरी है। - यानी: - स्वाध्याय, संयम, ध्यान आदि से हम अपनी आन्तरिक योग्यता (योग्यता‑निर्माण) बढ़ाते हैं, - तभी उत्तम परिणाम (सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान, सम्यक्चरित्र, आत्मानुभव) प्रकट होने योग्य बनते हैं।
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6. तीनों पर पुनः छोटा सार
किसी एक ही परिणाम के लिए:
- त्रिकाली उपादान कारण
- स्थायी द्रव्य (मिट्टी / आत्मा)
- अनन्तर‑पूर्व क्षणवर्ती पर्याय
- परिणाम से ठीक पहले की अंतिम अवस्था
- तत्समय की योग्यता
- जिस क्षण नया परिणाम प्रकट हुआ, उसी क्षण उस द्रव्य की - “अब यह परिणाम होगा ही” – ऐसी मजबूत आन्तरिक क्षमता
क्षणिक उपादान के संक्षिप्त नाम:
- अनन्तर‑पूर्व क्षणवर्ती पर्याय
- तत्समय की योग्यता
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7. दिगम्बर–श्वेताम्बर दृष्टि
- यह विषय मुख्यतः तत्त्वचर्चा / न्याय / कारण‑कार्य‑सिद्धान्त का है।
- दिगम्बर और श्वेताम्बर – दोनों परम्पराओं में
- केवल ग्रन्थों के नाम, भाषा या व्याख्या‑शैली में थोड़ा अंतर हो सकता है,
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यदि आप चाहें तो, मैं अगली बार विशेष रूप से जीव‑कर्म सिद्धान्त में “तत्समय की योग्यता” कैसे लागू होती है – इसे सिर्फ जीव‑उदाहरणों से और भी सरल तरीके से समझा सकता हूँ।