Ashta mangal me kinka sthan hai
अष्टमंगल का जैन धर्म में विशेष महत्व है। "अष्टमंगल" का अर्थ है आठ शुभ चिह्न या प्रतीक, जिन्हें शुभता, समृद्धि और आध्यात्मिक उन्नति के प्रतीक के रूप में माना जाता है। ये आठ मंगल निम्नलिखित हैं:
- स्वस्तिक (Swastika) – शुभता और सम्यक दर्शन का प्रतीक।
- श्रिवत्स (Shrivatsa) – भगवान के वक्षस्थल पर विशेष चिन्ह।
- नंद्यावर्त (Nandavarta) – समृद्धि और कल्याण का प्रतीक।
- वर्दमान घट (Kalasha or vardhman ghata) – समृद्धि एवं सम्पन्नता का प्रतीक।
- मीन युगल (Pair of fish/Min-yugal) – साहस और निर्विघ्नता का प्रतीक।
- दर्पण (Mirror/Darpan) – आत्म-ज्ञान और स्पष्टता का प्रतीक।
- वज्र (Vardha or Vajra) – शक्ति और स्थिरता का प्रतीक।
- पद्म (Lotus/Padma) – पवित्रता और दिव्यता का प्रतीक।
इनका स्थान जैन पूजा, जिनालय (मंदिर), और मंगल अवसरों पर विशेष रूप से होता है। ये मंगल चिन्ह जैन तीर्थंकरों के जन्म, दीक्षा और मोक्ष कल्याणकों पर भी अंकित किए जाते हैं। अष्टमंगल चिन्हों को पूजा की थाली, मंदिर की दीवारों, और विभिन्न धार्मिक आयोजनों में सजाया जाता है।
इस प्रकार, अष्टमंगल का जैन धर्म में अत्यंत पवित्र और शुभ स्थान है।