शालीभद्र का पुर्व भव कौनसा था in jainism
जैन कथाओं के अनुसार
शालीभद्र का पूर्व‑भव उनका पिछला जन्म एक बहुत गरीब बालक के रूप में बताया गया है, जो अपनी माता के साथ रहता था। उस जन्म में –
- वह बालक इतना गरीब था कि खीर जैसा साधारण पकवान भी कभी नहीं खाया था।
- एक दिन उत्सव पर वह रोने लगा, तो उसकी माँ ने पड़ोस से दूध, चावल, चीनी उधार लेकर उसके लिए खीर बनाई।
- जैसे ही वह खीर खाने बैठा, तभी एक जैन मुनि (साधु) “धर्म लाभ” कहते हुए भिक्षा के लिए द्वार पर आए।
- उस बालक ने अपना भूख‑प्यास भूल कर, पूरी खीर प्रसन्न मन से मुनि को अर्पण कर दी।
इसी निष्काम दान (सुपात्र‑दान) के उत्तम पुण्यफल से अगले जन्म में वही जीव अत्यंत धनवान श्रावक शालीभद्र के रूप में जन्मा।
- प्रायः ग्रंथों में उस पूर्व‑जन्म के बालक का कोई विशेष नाम नहीं दिया जाता, उसे बस गरीब बालक / चरवाहा लड़का आदि रूप में ही बताया जाता है।
- श्वेताम्बर व दिगम्बर परम्परा, दोनों में मूल भाव यही है कि
शालीभद्र की कथा, धन और वैभव के बीच भी दान, वैराग्य और त्याग की उत्कृष्ट प्रेरणा देती है। इस विषय पर सरल रूप में आप और पढ़ सकते हैं यहाँ: “who was shalibhadra”