धर्मध्यान करते करते आर्तध्यान करने वाले मुनि का नाम in jainism
आपका प्रश्न जैनधर्म से ही जुड़ा है, लेकिन “धर्मध्यान करते‑करते आर्तध्यान करने वाले मुनि का नाम” जैसा कोई स्पष्ट, प्रसिद्ध उदाहरण नाम सहित मुझे प्रामाणिक जैन ग्रन्थों में नहीं मिलता।
अक्सर आर्तध्यान और धर्मध्यान के उदाहरण इस तरह दिये जाते हैं:
- आर्तध्यान – जब दुख, रोग, वियोग, भय आदि में फँसकर
- धर्मध्यान – जब वही परिस्थिति हो, परन्तु साधु समता, आत्मचिन्तन,
शिक्षा के लिए आचार्य लोग कभी‑कभी किसी काल्पनिक या लोक‑कथा जैसे उदाहरण से समझाते हैं कि “एक मुनि पहले धर्मध्यान में थे, फिर किसी दुःख या लगाव के कारण आर्तध्यान में चले गये।” ऐसे उदाहरणों के नाम हर ग्रन्थ या प्रवचन में अलग‑अलग भी हो सकते हैं, इसलिए किसी एक “फिक्स” नाम को शास्त्रीय रूप से सही कहना कठिन है।
इसलिए ईमानदारी से कहूँ तो: मुझे ऐसा कोई विशेष, सर्वमान्य मुनि‑नाम नहीं मिलता जिसके बारे में जैन आगम या प्रमुख टीकाओं में स्पष्ट लिखा हो कि “वे धर्मध्यान करते‑करते आर्तध्यान में चले गये।”
यदि आपने यह प्रश्न किसी विशेष किताब, प्रवचन या परीक्षा से सुना है, तो सम्भव है कि वह उसी ग्रन्थ / शिक्षक द्वारा दिया गया उदाहरण हो, न कि सार्वत्रिक रूप से प्रसिद्ध ऐतिहासिक मुनि।