एक मात्र कर्म जो सबसे बेस्ट है
जैन धर्म के अनुसार सबसे ऊँचा, एक मात्र “बेस्ट” कर्म = राग‑द्वेष छोड़कर अहिंसा‑पूर्ण आत्मचिन्तन है।
इसे सरल में ऐसे समझिए:
- अंदर का कर्म (मुख्य)
- मन से राग‑द्वेष छोड़ना - आत्मा में स्थिर होना (स्व‑परिणमन, आत्मध्यान) यही वो कर्म है जो सारे पाप‑कर्मों के बन्ध को काटता है।
- बाहर का व्यवहार (उसका रूप)
- किसी भी जीव को मन, वचन, काया से कष्ट न देना = अहिंसा - सत्य, अचौर्य, ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह – ये सब अहिंसा के ही रूप हैं।
इसलिए संक्षेप में: राग‑द्वेष का त्याग कर अहिंसा‑पूर्वक रहना – यही जैन धर्म में सबसे श्रेष्ठ कर्म माना जाता है।