भगवान महावीर के लिए लोहअणगार गोचरी लाते थे क्या
संक्षिप्त उत्तर: नहीं, भगवान महावीर के लिए “लोहअणगार गोचरी” (लोहा, कोयला या इस प्रकार की कोई धातु/अखाद्य चीज़) जैसी गोचरी नहीं लाई जाती थी।
थोड़ा विस्तार से समझें:
- गोचरी का अर्थ क्या है?
“गोचरी” का सीधा अर्थ है – भिक्षा में लिया गया आहार (खाद्य पदार्थ)। यानी जो साधु-साध्वी भोजन के रूप में ग्रहण कर सकते हैं, वही गोचरी कहलाता है।
- भगवान महावीर का आहार कैसा था?
भगवान महावीर ने सख्त नियमों के साथ भिक्षा ली: - केवल शुद्ध, शाकाहारी आहार - जीव हिंसा कम-से-कम हो (जड़ पदार्थ, उबालकर, छानकर आदि) - बिना आसक्ति, बिना स्वाद-लालसा के - जो स्वयं शिष्य नहीं पकवाते, केवल जो सहज श्रद्धा से कोई दे दे
धातु (लोहा), कोयला, पत्थर, लकड़ी आदि तो आहार की श्रेणी में ही नहीं आते, इसलिए उन्हें गोचरी कहना ही गलत है।
- ऐतिहासिक वर्णनों में क्या मिलता है?
आचार्यों ने महावीर स्वामी के आहार के उदाहरण देते समय हमेशा अनाज, दाल, सब्जी, उबला हुआ भोजन, छानकर दिया पानी आदि की ही चर्चा की है – कहीं भी “लोह” या धातु को गोचरी के रूप में स्वीकार करने की बात नहीं मिलती।
इसलिए यह मान्यता या सुनी-सुनाई बात कि “भगवान महावीर के लिए लोहअणगार गोचरी लाते थे” – जैन आगमों और प्रामाणिक ग्रंथों के अनुसार सही नहीं है। गोचरी हमेशा खाने योग्य, अहिंसक, साधु के नियमों के अनुसार शुद्ध भोजन ही रही है।