Do pratikraman ke sutra
“दो प्रतिक्रमण” से आम तौर पर श्वेताम्बर मूर्तिपूजक परम्परा में – 1) पोर्षी प्रतिक्रमण (सुबह) 2) देवासी प्रतिक्रमण (शाम) का संक्षिप्त (लघु) रूप समझा जाता है।
इन दोनों में मुख्य रूप से वही सूत्र आते हैं, केवल समय और कुछ क्रम में थोड़ा अन्तर होता है। नीचे बहुत संक्षेप में “दो प्रतिक्रमण” में पढ़े जाने वाले प्रमुख सूत्रों के नाम दे रहा हूँ (पूरा पाठ यहाँ देना बहुत लम्बा हो जायेगा):
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1. मंगलाचरण / नमस्कार
- णमो अरिहंताणं
- णमो सिद्धाणं
- णमो आयरियाणं
- णमो उवज्झायाणं
- णमो लोए सव्वसाहूणं
- एवṁ च दुण्णं पंचण्णं (नमोकार मन्त्र का पूरा रूप)
कई स्थानों पर साथ में:
- णमुत्थुणं नमो तित्थसहस्साणं…
- जये जये लज्जा… (स्थापना आदि के प्रसंग में)
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2. अनुयोग / अनुमोदना के सूत्र
(देवासी और पोर्षी दोनों में, छोटे–मोटे अन्तर के साथ)
- सन्नति–करना / संयम–संकल्प के सूत्र
- कायोत्सर्ग भावना से सम्बन्धित छोटे सूत्र
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3. इरियावाहिय–सूत्र समूह
श्रुतियों में जिनसे चल–फिर, बैठना, सोना आदि में हुए पापों की क्षमा माँगी जाती है:
- इऱियावहिय–सूत्र (Iriyāvahiyā)
- तस्स–उत्तरी–कारण–सूत्र (Tassa uttari)
- अन्नत्थ–सूत्र (Annattha)
ये तीनों मिलकर “इरियावाहिय–पद” कहलाते हैं।
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4. आलम्बन / लोगस्स आदि
- लोगस्स (Logassa उवसग्गहरं) – २४ तीर्थंकरों की वन्दना
- जावन्ति चेय्यम… – चौबीस जिनालयों की स्तुति
- कई जगह जिण–कुण्डलय–स्तोत्र आदि भी जोड़े जाते हैं (पर यह मण्डल/घर की परम्परा पर निर्भर होता है)
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5. प्रतिक्रमण–सूत्र (मुख्य)
यहीं “प्रतिक्रमण” नाम का मुख्य भाग आता है:
- “इच्छामि खमत्थुं समणे भगवं…” से प्रारम्भ होने वाले
- त्रिकाल स्मरण –
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6. प्रत्याख्यान / संकल्प सूत्र
- “इच्छामि समायिक्कं करिस्सामि…” (समायिक के समय)
- प्रतिक्रमण के अन्त में
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7. क्षमापना (कषाय–शमन)
अन्त में:
- “मिच्छामि दुक्कडं” –
- गुरु, देव, धर्म, साधु–समाज, माता–पिता, परिवार, सभी से क्षमा माँगने वाले छोटे–छोटे सूत्र/वचन।
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8. देवासी और पोर्षी में अन्तर (संक्षेप में)
- पोर्षी प्रतिक्रमण (सुबह)
- देवासी प्रतिक्रमण (शाम)
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दिगम्बर परम्परा के बारे में
दिगम्बर परम्परा में “प्रतिक्रमण” की पद्धति, मन्त्र और सूत्रों के नाम कई जगह भिन्न हैं। वहाँ २८ मूलगुण, ५ महाव्रत–अनुव्रत, क्षमापना, स्वाध्याय आदि पर अधिक जोर रहता है। इसलिए “दो प्रतिक्रमण” (देवासी–पोर्षी) वाला यह रूप मुख्यतः श्वेताम्बर मूर्तिपूजक परम्परा का माना जाये।
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पूरा सूत्र–पाठ कैसे लें?
पूरा प्रतिक्रमण–सूत्र (शब्दशः) क़ाफी लम्बा होता है और परम्परा/स्थान के अनुसार थोड़ा बदल भी जाता है। इसलिए:
- अपने गृह–समाज या स्थानीय जैन मंदिर में जो “दो प्रतिक्रमण” की पुस्तिका / ऑडियो चलता है, वही मानक मानें।
- रोज़ कम से कम नमोकार, लोगस्स, इरियावहिय–पद, मिच्छामि दुक्कडं
यदि आप चाहें तो मैं किसी एक–एक छोटे सूत्र (जैसे लोगस्स, इरियावहिय, मिच्छामि दुक्कडं आदि) का सरल अर्थ और करने का तरीका अलग–अलग उत्तर में बहुत साफ़ और छोटे रूप में समझा सकता हूँ।