Ek tirth jo gam lekar ghumta hai
“Ek tirth jo gam lekar ghumta hai” को बहुत सरल भाषा में समझें:
- तिर्थ (Tirth) = जहाँ धर्म होता है, जहाँ से जीव संसार-सागर से पार होने का मार्ग पाते हैं।
- शास्त्रों में साधु–संतों को “चलित तीर्थ” (चलने वाला तिर्थ) कहा गया है।
इस वाक्य का भाव यह हो सकता है:
- एक ऐसा तीर्थ जो गाँव–गाँव (गाम) घूमता है
- यानी जैन साधु या आचार्य, जो निरंतर विहार करते हैं, किसी एक स्थान पर स्थायी रूप से नहीं रहते,
- जहाँ-जहाँ जाते हैं, वहाँ सम्यक् दर्शन, सम्यक् ज्ञान, सम्यक् चरित्र की प्रेरणा देकर उस जगह को धर्मस्थल जैसा पवित्र बना देते हैं।
मुख्य भाव जैसे मंदिर, जिनालय आदि स्थिर तिर्थ हैं, वैसे ही सच्चे मुनिराज, आचार्य, आर्यिका आदि स्वयं चलित तिर्थ हैं – वे जहाँ भी जाते हैं, वहाँ धर्म, अहिंसा, संयम और आत्मकल्याण का संदेश ले जाते हैं।
यदि आप चाहें तो मैं “चलित तिर्थ” (चरणरत जैन साधु) की विशेषताएँ भी बिंदुवार समझा सकता हूँ – लेकिन मूल पंक्ति का भाव यही है कि एक ऐसा तिर्थ, जो स्वयं गाँव–गाँव घूमता है – वह जैन संत हैं।