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    Process of digambar choka

    6 months ago 113

    “चोका” शब्द का अर्थ है – साधु‑साध्वियों के अहार (भोजन) के लिए गृहस्थ द्वारा किया गया विशेष व शुद्ध प्रबंध। दिगम्बर परम्परा में चोका की प्रक्रिया बहुत नियमबद्ध और पवित्र मानी जाती है।

    नीचे साधारण, आसान भाषा में पूरा क्रम दिया है:

    ---

    1. चोका रखने का संकल्प (नियम)

    • गृहस्थ पहले मन में संकल्प करता है कि –
    “मैं आज दिगम्बर मुनिराज/आर्यिका के लिए अहार का चोका रखूँगा।”
    • उसी के अनुसार उस दिन:
    - झूठ, क्रोध, झगड़ा, हिंसा आदि से विशेष बचने का प्रयास - मन शुद्ध और शांत रखना - कई लोग उस दिन विशेष संयम भी रखते हैं (जैसे – एकासना, उपवास, स्वाध्याय आदि)

    ---

    2. स्थान की तैयारी

    • जहाँ अहार कराया जाएगा, उस स्थान को:
    - अच्छी तरह साफ़ किया जाता है - झाड़ू देकर, पोछा लगाकर, धूल‑कचरा हटाया जाता है
    • उस स्थान पर:
    - ज़मीन पर स्वच्छ चौक‑पूजन या केवल साफ़ चौक (आकृति) बनाई जाती है - चारों ओर अशुद्ध वस्तु, जूते‑चप्पल, गंदगी आदि न हों
    • वातावरण शांत हो, अनावश्यक शोर, टीवी, मोबाइल, तेज़ गाना आदि न हों।

    ---

    3. भोजन (अहार) की तैयारी

    दिगम्बर मर्यादा के अनुसार अहार बनाते समय कुछ मुख्य बातें:

    • भोजन शुद्ध शाकाहारी हो, हिंसक पदार्थ (अंडा, मांस, शराब आदि) न हों
    • सामान्यत: जैन गृहस्थ:
    - कन्द‑मूल (आलू, प्याज़, लहसुन आदि) नहीं रखते (ये परिवार/परम्परा पर निर्भर है)
    • भोजन बनाते समय:
    - अधिक से अधिक शांत भाव, कम बोलना - क्रोध, कलह, अशुद्ध भाव से बचना - कोशिश होती है कि भोजन बनाते समय उसे चखा न जाए
    • जल:
    - प्रायः पहले से छाना हुआ, स्वच्छ (पूर्वनिर्धारित समय के भीतर का)
    • भोजन बहुत तामसिक या अत्यधिक स्वाद‑प्रधान न हो, साधु‑जीवन की सरलता के अनुरूप हो:
    - हल्का, सरल, संयमी भोजन

    ---

    4. चोका सजाने की विधि

    जब भोजन तैयार हो जाए, तब:

    • अलग‑अलग पात्रों में रोटी, सब्ज़ी, दाल, चावल आदि रखा जाता है
    • सब कुछ ढका हुआ हो, मक्खी‑कीट आदि से बचा हो
    • जहाँ मुनिराज/आर्यिका अहार लेंगे, वहाँ:
    - स्वच्छ चौक पर पात्रों को क्रम से रखा जाता है - बीच में या थोड़ी दूरी पर खड़े/बैठने की जगह रखी जाती है (मर्यादा के अनुसार)

    दिगम्बर मुनियों का नियम (सामान्य रूप से):

    • वे दिन में केवल एक बार अहार लेते हैं
    • अनेक परम्पराओं में मुनिराज खड़े‑खड़े, अपने हाथों में या एक पात्र में सीमित मात्रा में भोजन स्वीकार करते हैं
    • आर्यिका‑संसंघ में भी शास्त्रीय मर्यादा के अनुसार सरल, सीमित अहार लिया जाता है

    ---

    5. मुनिराज/आर्यिका को आमंत्रण (गृहस्थ का कर्तव्य)

    दिगम्बर परम्परा में:

    • साधु‑साध्वी स्वयं नगर/ग्राम में गोहारी के लिए निकलते हैं
    • गृहस्थ उनसे पहले से “पक्का बुलावा” तय नहीं करते (आम नियम)
    • गोहारी के समय:
    - गृहस्थ विनम्रता से folded hands से निवेदन करते हैं - यदि मुनिराज की आज्ञा और नियम अनुकूल हों, तो वे चोका स्वीकार करते हैं
    • कभी‑कभी पहले से “आज्ञा” लेकर भी कुछ विशेष अवसरों पर चोका रखा जाता है – यह परम्परा के अनुसार बदल सकता है।

    ---

    6. मुनिराज/आर्यिका का आगमन और वंदना

    जब मुनिराज/आर्यिका चोका‑स्थल पर पहुँचते हैं:

    • गृहस्थ परिवार द्वार पर या अंदर विनम्रता से वंदना करता है
    • नमस्कार महामंत्र, अर्हत वंदना आदि स्तुति भाव से कही जा सकती है (परम्परा अनुसार)
    • उन्हें चोका‑स्थल तक पुन: नम्रता से मार्ग दिखाया जाता है, बिना उन्हें छुए, उचित दूरी रखते हुए।

    ---

    7. अहार ग्रहण की मर्यादा (दिगम्बर रीति)

    अहार देने का तरीका:

    1. मुनिराज/आर्यिका जहाँ ठहरते हैं, वहाँ वे:

    - पहले पात्र/हाथ को देखते हैं – कहीं जीव आदि तो नहीं, भोजन ठीक है या नहीं

    1. गृहस्थ:

    - अत्यंत शांति से, बिना बोल‑चाल के (या न्यूनतम वाणी से) - थोड़ा‑थोड़ा करके भोजन अर्पित करता है

    1. मुनिराज:

    - केवल उतनी ही मात्रा ग्रहण करते हैं, जितनी उनके लिए आवश्यक है - वे स्वयं “बस” के संकेत से अधिक भोजन रोक देते हैं

    1. कुछ मुख्य बिंदु:

    - केवल एक बार, एक ही चोका से अहार – दिन भर में दूसरी बार भोजन नहीं - भोजन के समय हँसी‑मज़ाक, दुनिया‑दारी की बातें, रोना‑धोना आदि नहीं - पूरा वातावरण शांत, धर्म‑मय रहता है

    ---

    8. अहार के बाद की प्रक्रिया

    अहार पूर्ण होने के बाद:

    • मुनिराज/आर्यिका:
    - नमस्कार, मंगलाशीस या स्तवन के माध्यम से कल्याण‑कामना करते हैं
    • गृहस्थ:
    - मन से क्षमा‑याचना करता है – “यदि मुझसे किसी प्रकार की चूक हो गई हो, तो क्षमा करें।”
    • कई बार गृहस्थ:
    - दक्षिणा/गोचर हेतु सूखा आहार या अन्य आवश्यक वस्तु (मर्यादा अनुसार) भी अर्पित करते हैं - यह सब बिना लोभ, केवल सेवा‑भाव से

    ---

    9. चोका का आध्यात्मिक उद्देश्य

    दिगम्बर परम्परा में चोका केवल “भोजन कराना” नहीं है, बल्कि:

    • मुनिराज के तप, स्वाध्याय और कठोर संयम का सहयोग
    • गृहस्थ के लिए:
    - अत्यंत पवित्र पुण्य का कार्य - अहिंसा, संयम, दान, विनय आदि गुणों की साधना
    • दोनों पक्षों का लक्ष्य:
    - आत्मा की शुद्धि - राग‑द्वेष में कमी - मोक्ष‑मार्ग में प्रगति

    ---

    यह सामान्य, व्यवहारिक रूप से दिगम्बर चोका की प्रक्रिया है। थोड़े‑बहुत नियम अलग‑अलग संघ/परम्परा में बदल सकते हैं, पर मूल भाव यही रहता है – शुद्ध अहार, शुद्ध भाव और विनय‑पूर्वक सेवा।

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