Process of digambar choka
“चोका” शब्द का अर्थ है – साधु‑साध्वियों के अहार (भोजन) के लिए गृहस्थ द्वारा किया गया विशेष व शुद्ध प्रबंध। दिगम्बर परम्परा में चोका की प्रक्रिया बहुत नियमबद्ध और पवित्र मानी जाती है।
नीचे साधारण, आसान भाषा में पूरा क्रम दिया है:
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1. चोका रखने का संकल्प (नियम)
- गृहस्थ पहले मन में संकल्प करता है कि –
- उसी के अनुसार उस दिन:
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2. स्थान की तैयारी
- जहाँ अहार कराया जाएगा, उस स्थान को:
- उस स्थान पर:
- वातावरण शांत हो, अनावश्यक शोर, टीवी, मोबाइल, तेज़ गाना आदि न हों।
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3. भोजन (अहार) की तैयारी
दिगम्बर मर्यादा के अनुसार अहार बनाते समय कुछ मुख्य बातें:
- भोजन शुद्ध शाकाहारी हो, हिंसक पदार्थ (अंडा, मांस, शराब आदि) न हों
- सामान्यत: जैन गृहस्थ:
- भोजन बनाते समय:
- जल:
- भोजन बहुत तामसिक या अत्यधिक स्वाद‑प्रधान न हो, साधु‑जीवन की सरलता के अनुरूप हो:
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4. चोका सजाने की विधि
जब भोजन तैयार हो जाए, तब:
- अलग‑अलग पात्रों में रोटी, सब्ज़ी, दाल, चावल आदि रखा जाता है
- सब कुछ ढका हुआ हो, मक्खी‑कीट आदि से बचा हो
- जहाँ मुनिराज/आर्यिका अहार लेंगे, वहाँ:
दिगम्बर मुनियों का नियम (सामान्य रूप से):
- वे दिन में केवल एक बार अहार लेते हैं
- अनेक परम्पराओं में मुनिराज खड़े‑खड़े, अपने हाथों में या एक पात्र में सीमित मात्रा में भोजन स्वीकार करते हैं
- आर्यिका‑संसंघ में भी शास्त्रीय मर्यादा के अनुसार सरल, सीमित अहार लिया जाता है
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5. मुनिराज/आर्यिका को आमंत्रण (गृहस्थ का कर्तव्य)
दिगम्बर परम्परा में:
- साधु‑साध्वी स्वयं नगर/ग्राम में गोहारी के लिए निकलते हैं
- गृहस्थ उनसे पहले से “पक्का बुलावा” तय नहीं करते (आम नियम)
- गोहारी के समय:
- कभी‑कभी पहले से “आज्ञा” लेकर भी कुछ विशेष अवसरों पर चोका रखा जाता है – यह परम्परा के अनुसार बदल सकता है।
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6. मुनिराज/आर्यिका का आगमन और वंदना
जब मुनिराज/आर्यिका चोका‑स्थल पर पहुँचते हैं:
- गृहस्थ परिवार द्वार पर या अंदर विनम्रता से वंदना करता है
- नमस्कार महामंत्र, अर्हत वंदना आदि स्तुति भाव से कही जा सकती है (परम्परा अनुसार)
- उन्हें चोका‑स्थल तक पुन: नम्रता से मार्ग दिखाया जाता है, बिना उन्हें छुए, उचित दूरी रखते हुए।
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7. अहार ग्रहण की मर्यादा (दिगम्बर रीति)
अहार देने का तरीका:
- मुनिराज/आर्यिका जहाँ ठहरते हैं, वहाँ वे:
- पहले पात्र/हाथ को देखते हैं – कहीं जीव आदि तो नहीं, भोजन ठीक है या नहीं
- गृहस्थ:
- अत्यंत शांति से, बिना बोल‑चाल के (या न्यूनतम वाणी से) - थोड़ा‑थोड़ा करके भोजन अर्पित करता है
- मुनिराज:
- केवल उतनी ही मात्रा ग्रहण करते हैं, जितनी उनके लिए आवश्यक है - वे स्वयं “बस” के संकेत से अधिक भोजन रोक देते हैं
- कुछ मुख्य बिंदु:
- केवल एक बार, एक ही चोका से अहार – दिन भर में दूसरी बार भोजन नहीं - भोजन के समय हँसी‑मज़ाक, दुनिया‑दारी की बातें, रोना‑धोना आदि नहीं - पूरा वातावरण शांत, धर्म‑मय रहता है
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8. अहार के बाद की प्रक्रिया
अहार पूर्ण होने के बाद:
- मुनिराज/आर्यिका:
- गृहस्थ:
- कई बार गृहस्थ:
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9. चोका का आध्यात्मिक उद्देश्य
दिगम्बर परम्परा में चोका केवल “भोजन कराना” नहीं है, बल्कि:
- मुनिराज के तप, स्वाध्याय और कठोर संयम का सहयोग
- गृहस्थ के लिए:
- दोनों पक्षों का लक्ष्य:
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यह सामान्य, व्यवहारिक रूप से दिगम्बर चोका की प्रक्रिया है। थोड़े‑बहुत नियम अलग‑अलग संघ/परम्परा में बदल सकते हैं, पर मूल भाव यही रहता है – शुद्ध अहार, शुद्ध भाव और विनय‑पूर्वक सेवा।