Satvi narak valo ki ek matr gati
“सातवीं नरक वालों की एक मात्र गति” – ऐसा कहना सही नहीं है।
जैन सिद्धांत के अनुसार:
- किसी भी नरक (१ से ७) के नारकी की मृत्यु के बाद
- नरक से निकलकर उसकी केवल दो ही संभावित गतियाँ हैं:
ग्रंथों में यह नियम “नरक गति का जीव मृत्यु के बाद केवल मनुष्य या तिर्यंच – इन दो ही गतियों में जाता है” के रूप में स्पष्ट कहा गया है। ( jainqq.org)
भगवान महावीर का उदाहरण भी यही दिखाता है – वे १९वें भव में सातवीं नरक में थे, और वहाँ से निकलकर २०वें भव में सिंह (तिर्यंच गति) में जन्म लेते हैं, न कि किसी और नरक या देव गति में। ( jainqq.org)
इसलिए: सातवीं नरक वालों की “एक मात्र” नहीं, बल्कि दो गतियाँ हैं – मनुष्य और तिर्यंच।