आहार परठते वक्त किसने अपने घाती कर्म परठे जैन धर्म के अनुसार
जैन धर्म के अनुसार घाती कर्म (ज्ञानावरण, दर्शनावरण, मोहनीय, अन्तराय) का पूरी तरह नाश केवलज्ञान प्राप्त होने के समय होता है, न कि आहार (भोजन) लेते समय।
मुख्य बातें साफ़‑साफ़ समझिए :
- घाती कर्म कब नष्ट होते हैं?
- जब जीव केवलज्ञान (सर्वज्ञता) प्राप्त करता है, उसी क्षण उसके चारों घाती कर्मों का क्षयोपशम होकर पूर्ण नाश हो जाता है। - उस समय वह अर्हन्त बनता है। - यह सिद्धांत सभी तीर्थंकरों और केवली मुनियों पर समान रूप से लागू होता है।
- क्या किसी ने “आहार लेते समय” अपने घाती कर्म नष्ट किए?
- प्रामाणिक आगमों/जैन सिद्धांतों में ऐसा नहीं मिलता कि किसी ने भोजन ग्रहण करते समय ही अपने घाती कर्म नष्ट कर लिए हों। - आहार से सम्बन्धित तो आहार की शुद्धि, मर्यादा, नियम, अहिंसा आदि के नियम मिलते हैं; लेकिन घाती कर्म का नाश हमेशा उच्च तप, साधना, और केवलज्ञान की प्राप्ति के प्रसंग से जोड़ा गया है, न कि आहार-ग्रहण से।
- उदाहरण के रूप में:
- भगवान महावीर ने घोर तपस्या के बाद चैत्र शुक्ल दशमी को केवलज्ञान पाया – उसी समय उनके घाती कर्म नष्ट हुए, यह प्रसंग आहार से नहीं जुड़ा है। - भगवान ऋषभदेव को श्रेयांस कुमार से प्रथम आहार (इक्षु-रस) अक्षय तृतीया के दिन मिला, पर घाती कर्म का नाश तो बाद में केवलज्ञान के समय ही माना जाता है, प्रथम आहार के समय नहीं।
इसलिए, “आहार परठते (लेते) समय किसने अपने घाती कर्म नष्ट किए?” – ऐसा कोई विशिष्ट प्रसंग जैन आगमों में प्रसिद्ध नहीं है। घाती कर्म का नाश हमेशा केवलज्ञान की प्राप्ति के साथ ही जोड़ा जाता है, आहार के साथ नहीं।