देवता में धूर्त देवता कौन है in jain agam
जैन आगम के अनुसार “धूर्त देवता” नाम से कोई अलग, निश्चित वर्ग (category) नहीं बताया गया है।
कुछ बातें स्पष्ट रखना ज़रूरी हैं:
- “धूर्त” शब्द आगमों में
“धूर्त” शब्द मुख्य रूप से कपटी / छल करने वाले मुनियों (कपटी साधुओं) के लिए आता है, जैसे – धूर्त मुनि, जो बाहर से साधु की तरह रहते हैं, पर भीतर से नियमों का उल्लंघन करते हैं। इसे लेकर धूर्तकल्प आदि ग्रंथों में विस्तार से चर्चा है, पर यह साधुओं के बारे में है, देवताओं के बारे में नहीं।
- देवता की सामान्य विभाग‑रचना
आगमों और तत्त्वार्थसूत्र आदि में देवताओं के चार मुख्य वर्ग बताए जाते हैं: - भवनवासी देव - व्यंतर देव - ज्योतिष्क देव - वैमानिक देव
इन चारों वर्गों में भी आगे बहुत‑सी जातियाँ और उप‑विभाग हैं, पर इनमें कहीं “धूर्त देवता” नाम से कोई स्थायी, मानक वर्ग नहीं दिया गया।
- देव भी मिथ्यात्व व कषाययुक्त हो सकते हैं
जैन सिद्धांत के अनुसार देवगति के जीव भी पुण्य के कारण देव बने हैं, पर उनमें राग‑द्वेष, मोह, मिथ्यात्व आदि रह सकते हैं। इसलिए कुछ देव कपटी या मोहग्रस्त हो सकते हैं, पर उन्हें तकनीकी रूप से “धूर्त देवता” नाम से किसी एक निश्चित सूची में नहीं रखा गया है।
इसलिए आपके प्रश्न का सीधा उत्तर यह है: जैन आगमों में देवताओं में कोई विशेष वर्ग “धूर्त देवता” के नाम से निर्धारित नहीं है; “धूर्त” शब्द मुख्य रूप से कपटी मुनियों के लिए प्रयोग होता है, न कि किसी निश्चित देव‑वर्ग के लिए।