विशेष गाथा / शब्द “सबसे बड़ा बन” जैसा आगम में आया हो – उसका अर्थ जानना?
आगम के शब्दों की दृष्टि से और अर्थ की दृष्टि से – दोनों बातें अलग‑अलग समझना ज़रूरी है।
1. क्या “सबसे बड़ा बन” जैसा वाक्य सीधे आगम (अर्धमागधी/प्राकृत) में है?
अर्धमागधी आगमों में तो यह ठीक‑ठीक हिंदी वाक्य “सबसे बड़ा बन” इस रूप में नहीं आता। वहाँ पद आते हैं जैसे –
- उत्तम, परम, परमपुज्य, लुग्ग-परमेसर आदि,
इसलिए:
- शाब्दिक रूप से “सबसे बड़ा बन” = नहीं है।
- लेकिन भावार्थ – “सर्वोच्च / परम अवस्था प्राप्त करना” – आगम में अनेक जगह पर है, विशेषकर सिद्ध भगवान, अरहंत भगवान, केवली आदि के वर्णन में।
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2. “सबसे बड़ा बन” का जैन‐दृष्टि से सही अर्थ क्या होगा?
जैन दर्शन में “सबसे बड़ा” का मतलब शरीर, कद‑काठी, पद, पैसा, शक्ति आदि से कभी भी नहीं होता।
“बड़प्पन” के दो स्तर माने जा सकते हैं:
(क) व्यवहार से (सापेक्ष दृष्टि)
- कोई धनी है, कोई उससे अधिक धनी – तो बड़ा‑छोटा चल सकता है।
- कोई राजा है, कोई चक्रवर्ती – तो बड़ा‑छोटा कहा जा सकता है।
(ख) निश्चय से (परम दृष्टि – असली जैन अर्थ)
जिनवाणी का असली संदेश यह है कि:> जितना “अकिंचन” (बिलकुल निरपरिग्रही, निर्लोभी, निरमोह) हो जाएगा, वही सच्चे अर्थ में “सबसे बड़ा” है।
क्यों?
- जिसके पास धन‑वैभव है, उससे ज़्यादा किसी और के पास हो सकता है – तो वह और बड़ा कहलाएगा।
- इस तरह “बड़प्पन” कभी स्थिर नहीं रहता, हमेशा कोई‐न‐कोई उससे आगे निकल सकता है।
- परंतु जो पूर्ण “अकिंचन” (भीतर‑बाहर से परिग्रह रहित, राग‑द्वेष रहित, अहिंसा‑सम्यक ज्ञान‑सम्यक दर्शन‑सम्यक चरित्र से युक्त) हो गया – वह आत्मा ही सिद्ध‑पद को पहुँचकर परम हो जाती है।
इसलिए “सबसे बड़ा बन” – जैन अर्थ में यह होगा:
> “ऐसा निर्विकल्प, अकिंचन, निरपरिग्रही, राग‑द्वेष रहित परमात्मा बन, > कि तेरे से बड़ा कोई न रहे – अर्थात् सिद्ध‑पद को प्राप्त कर।”
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3. आगमिक भाव से सार निष्कर्ष
आगम की दृष्टि से –
- सभी आत्माएँ द्रव्य‑तत्त्व से समान हैं – न कोई स्वभाव से छोटा, न कोई बड़ा।
- जो आत्मा राग‑द्वेष, परिग्रह, मोह आदि को पूरी तरह छोड़कर
इसलिए:
- “सबसे बड़ा बन” =
यही अर्थ आगमिक भाव, जैन तत्वज्ञान और साधना – सबके साथ पूरा मेल खाता है।