बंधन मे रह कर किसने बंधन तोड़ा in jainism
“बंधन में रहकर किसने बंधन तोड़ा?” जैन परंपरा में यह पंक्ति प्रायः भगवान बाहुबली (गोम्मटेश्वर) के लिए कही जाती है।
कैसे?
- बाहुबली जी दीक्षा लेकर कायोत्सर्ग में इतने लंबे समय तक एक ही आसन में खड़े रहे
- लेकिन इन्हीं परिस्थिति में, उन्होंने अंतरंग (कर्म) बंधनों – राग-द्वेष, अहंकार आदि को तोड़ दिया।
- परिणाम: उन्होंने केवलज्ञान प्राप्त किया – अर्थात सारा कर्मबंध लगभग नष्ट हो गया,
इसलिए कहा जाता है कि बाहरी बंधन में रहते हुए भी, भगवान बाहुबली ने भीतर के वास्तविक बंधन (कर्मबंध) को तोड़ा। जैन दृष्टि से असली बंधन शरीर, संबंध या रस्सी नहीं, बल्कि कर्म और भावों का बंधन है – जिसे बाहुबली जी ने वहीं खड़े‑खड़े नष्ट कर दिया।