भगवान की प्रसंसा सुन कर किस को ईर्ष्या हुई थी in jainism.
आपका सवाल थोड़ा अधूरा‑सा है, इसलिए सीधे‑सीधे नाम बताना मुश्किल है।
“भगवान की प्रशंसा सुन कर किसे ईर्ष्या हुई थी?” — ऐसे वाक्य से कई कथाएँ बनती हैं, जैसे:
- कभी देवलोक के कुछ देव, जब केवलज्ञान प्राप्त हुए तीर्थंकर की बहुत स्तुति सुनते हैं, तो अपने कम पुण्य या कम महिमा देखकर भीतर ही भीतर ईर्ष्या या हीन‑भावना अनुभव करते हैं।
- कुछ सांसारिक पात्र (राजा, गुरु, शिष्य, रिश्तेदार आदि) किसी तीर्थंकर या महात्मा की अधिक प्रशंसा सुनकर ईर्ष्या करते हैं – जैसे गोशालक (महावीर प्रभु के समय का), या कुछ राजाओं की कथाएँ, पर हर कथा का वाक्य और प्रसंग अलग‑अलग है।
लेकिन आपके प्रश्न की जिस तरह से पंक्ति है, वह किसी खास “पाठशाला‑प्रश्न” या किसी विशिष्ट कथा की लाइन लगती है (जैसे: “फलाँ भगवान की स्तुति सुनकर अमुक देव/पुरुष को ईर्ष्या हुई”) — ऐसा सटीक वाक्य किसी एक मानक, सर्वमान्य कथा से सीधे नहीं याद आ रहा है।
इसलिए दो बातें हो सकती हैं:
- यह किसी विशेष पाठशाला‑पुस्तक या स्थानीय प्रवचन में बताई गयी लाइन हो,
- या प्रश्न में कुछ शब्द छूट गए हों (जैसे किस भगवान का नाम, कौन‑सा प्रसंग, कौन‑सा अवतार/कथा आदि)।
मैं गलत तथ्य बताकर जैन धर्म की कथा को बिगाड़ना नहीं चाहूँगा, इसलिए:
- कृपया थोड़ा और संदर्भ बताइए:
तभी ठीक‑ठीक, परंपरा के अनुसार, सही व्यक्ति/पात्र का नाम बताया जा सकेगा।