सबसे प्राचीन भाषा कौन सी है in jainism
जैन धर्म के संदर्भ में “सबसे प्राचीन भाषा” की बात करें तो परंपरा में मुख्य रूप से दो स्तर पर उत्तर दिया जाता है:
- आध्यात्मिक / तत्त्वतः दृष्टि से
- अनादि काल से अनंत तीर्थंकर हुए हैं, उनकी दिव्यध्वनि सभी जीवों को अपने‑अपने देश की भाषा में समझ में आती है। - इसलिए कोई एक “मानवीय बोली” नहीं बताई जाती कि वही सबसे पहली थी; दिव्यध्वनि सर्वभाषा‑मयी मानी जाती है।
- ऐतिहासिक / ग्रंथों की भाषा के रूप में
- जिन भाषाओं में हमारे उपलब्ध प्राचीन जैन आगम और ग्रंथ लिखे गए हैं, उनमें प्राकृत (विशेषतः अर्धमागधी प्राकृत) को जैन परंपरा में मुख्य प्राचीन भाषा माना जाता है। - भगवान महावीर के उपदेश और प्रारम्भिक आगम अर्धमागधी प्राकृत में माने जाते हैं। - बाद में संस्कृत, अपभ्रंश और फिर देश‑देश की लोकभाषाओं (हिन्दी, गुजराती आदि) में भी जैन ग्रंथ लिखे गए, पर सबसे पुराने उपलब्ध जैन साहित्य की भाषा प्राकृत ही मानी जाती है।
इसलिए,
- तत्त्व की दृष्टि से – दिव्यध्वनि अनादि और सर्वभाषा‑रूप है, उसे किसी एक मानवीय भाषा तक सीमित नहीं किया जाता।
- ग्रंथ‑भाषा की दृष्टि से – जैन धर्म में प्राकृत (खासकर अर्धमागधी प्राकृत) को सबसे प्राचीन और मूल ग्रंथ‑भाषा माना जाता है।