आचार्य पद मिलने के समय कौन से सूत्र का पाठ पढ़ते हैं
आचार्य पद‑प्राप्ति के समय कोई एक ही “निश्चित” सूत्र पूरे जैन समाज में अनिवार्य रूप से नहीं माना गया है। अलग‑अलग परम्परा (दिगम्बर / श्वेताम्बर, गच्छ, संघ) में थोड़ा भेद होता है, लेकिन सामान्य रूप से ये पाठ अवश्य रखे जाते हैं:
- णमोक्कार / नवकार मंत्र
- सबसे पहले नवकार मंत्र ही पढ़ा जाता है। - उसमें विशेष रूप से “णमो आचारियाणं / नमो आचारियाणं” पंक्ति आचार्य पद के लिए अत्यन्त मंगल मानी जाती है।
- आचार्य‑वंदना / पंच परमेष्ठी वंदना
- कई जगह अलग से आचार्य वंदना (आचार्य भगवंत की स्तुति वाले श्लोक / सूत्र) पढ़े जाते हैं। - जैसे– पंच परमेष्ठी की वंदना, “चत्तारि मंगलं…” जैसे मंगलाचरण भी रखे जाते हैं।
- परम्परा‑विशेष स्तोत्र
- कुछ गच्छ / संघों में अपने‑अपने परम्परागत स्तोत्र (जैसे शांति स्तवन आदि) भी साथ में गाए जाते हैं, पर वह सार्वभौमिक नहीं हैं।
सार: आचार्य पद मिलने के समय मुख्य मंगल‑पाठ नवकार मंत्र (विशेषतः “नमो आचारियाणं”) और आचार्य‑वंदना ही माने जाते हैं; शेष स्तोत्र परम्परा के अनुसार बदलते रहते हैं।