मांगलिक कार्यों में क्या रखते है in jainism
जैन धर्म में “मांगलिक कार्य” (जैसे – नामकरण, मुंडन, सगाई, शादी, गृह‑प्रवेश, नई दुकान खोलना आदि) में मुख्य बात शुभ भाव और अहिंसा है। इन अवसरों पर आमतौर पर यह चीज़ें रखी/की जाती हैं:
1. देव‑पूजा / पाठ
- सबसे पहले नवकार मंत्र या लोगस्स / ऊवसग्गहरं / चतुर्विंशतिस्तव आदि का पाठ
- घर में या हॉल में जिनेन्द्र भगवान की प्रतिमा / चित्र आगे रखकर
- आरती – मंगल दीपन (दीपक, धूप, अगरबत्ती, फूल आदि)
2. मंगल चिह्न व प्रतीक
शुभता के लिए जैन घरों में जैसे‑जैसे परंपरा हो, ये रखे जाते हैं:- स्वस्तिक (आटा, हल्दी, रोली, चावल से बनाया हुआ)
- अष्टमंगल चिन्ह – स्वस्तिक, नंदावर्त, वर्दमान घट, मीन‑युगल, पद्म आदि (पूजा‑मंडप, प्रवेश‑द्वार या मंच पर सजावट में)
- चावल / अक्षत – स्वस्तिक, अरघ्य, कलश आदि के पास शुभता के रूप में
- नवरंगी / रोली‑चावल – तिलक व मांगलिक चिन्ह बनाने में
- कुछ परिवारों में जैन ध्वज, ओंकार / नवकार यंत्र, पंच‑परमेष्ठी की तस्वीर भी रखी जाती है।
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3. आहार व व्यवहार में सावधानी
मांगलिक दिन पर जैन परिवार प्रायः ये ध्यान रखते हैं:- मांस, अंडा, शराब, लहसुन‑प्याज, अत्यधिक तामसिक चीजें नहीं
- बहुत लोग रात्री‑भोजन नहीं करते या हल्का ही लेते हैं
- अनावश्यक हिंसा, झगड़ा, कठोर वाणी, गाली‑गलौज से बचते हैं
- ज्यादा से ज्यादा स्वाध्याय, स्वस्तिवाचन, मंगल पाठ, दान‑पुण्य करते हैं।
4. साधु‑साध्वी / ज्ञानीजनों का आशीर्वाद
- यदि संभव हो तो आचार्य / मुनिराज / आर्यिका / ज्ञानी श्रद्धेय का आशीर्वाद, प्रवचन आदि लेना सबसे बड़ा “मांगलिक” माना जाता है।
- न हो सके तो कम से कम जिनालय जाकर पूजा‑दर्शन किया जाता है।
संक्षेप में: जैन धर्म में मांगलिक कार्यों में मुख्य “क्या रखें” = शुभ भाव, जिनेन्द्र‑भक्ति, नवकार मंत्र, स्वस्तिक‑अष्टमंगल जैसे शुभ चिन्ह, सात्विक‑अहिंसक आहार और संयमी व्यवहार।