વ્યસ્ત रहने वाला किस्से मुक्त रहता है in jainism
“व्यस्त रहने वाला किस्से मुक्त रहता है” – यह वाक्य सिध्दान्त रूप से जैन दृष्टि से बिल्कुल उपयुक्त है, भले यह शास्त्र का सीधा उद्धरण नहीं, पर उसका भाव जैनाचार से मिलता‑जुलता है।
सरल अर्थ: जो व्यक्ति अपना समय
- स्वाध्याय (धर्म का अध्ययन),
- सुमिरन/जप,
- संयम, तप,
- अपने कर्तव्य (धर्मयुक्त काम)
में लगाकर “व्यस्त” रहता है, वह खाली बैठकर
- किस्से‑कहानी,
- परनिन्दा,
- चुगली,
- निरर्थक बहस,
जैसी कषाय बढ़ाने वाली बातों से बचा रहता है।
जैन धर्म में:
- व्यर्थ प्रलाप (फालतू बातें),
- परनिन्दा,
- झूठ, कठोर वचन – ये सब अहिंसा के विरुद्ध और पाप‑बन्ध कराने वाले बताए गए हैं।
- इसलिए “सद्भावना से, सीमित और हितकारी बोलना” तथा बाकी समय उपयोग (ध्यान, स्वाध्याय, सम्यक चिन्तन) में लगाना आदर्श माना गया है।
इसलिए यह वाक्य जैनदृष्टि से यह सिखाता है: जो धर्म और सद्कार्य में व्यस्त रहता है, वह किस्से‑कहानी और पापवाणी से काफी हद तक बच जाता है, और अपना आध्यात्मिक विकास कर सकता है।