पाप 10 प्रकार ક્યાં होते हैं in jainism
जैन धर्म में “पाप” की गिनती आम तौर पर 10 नहीं, इन प्रकार से मिलती है:
- ५ महापाप / पंच महाव्रत के विषय
ये 5 मुख्य पाप (जिनसे महाव्रत बनते हैं) हैं: 1. हिंसा (प्राणातिपात) – किसी भी जीव को कष्ट या मृत्यु देना 2. असत्य / झूठ (मृषावाद) – गलत बात बोलना 3. चोरी (अदत्तादान) – बिना अधिकार ली हुई वस्तु लेना 4. कुशील / मैथुन – इन्द्रियों का असंयमी उपयोग, काम-विकार 5. परिग्रह – अधिक संग्रह, आसक्ति, ममता
- १८ पाप / अष्ठादश पापस्थानक
आगमों में पाप की पूरी परंपरागत सूची १८ प्रकार से बताई गई है, जो “अधार पापस्थानक सूत्र” में आती है, जैसे – प्राणातिपात, मृषावाद, अदत्तादान, मैथुन, परिग्रह, क्रोध, मान, माया, लोभ, राग, द्वेष, कलह, अभ्याख्यान, पैशुन्य, रति‑अरति, पर‑परिवाद, माया‑मृषावाद, मिथ्यात्व‑शल्य। (यही प्रामाणिक १८ पाप हैं।) विस्तार से पढ़ने के लिए आप यहाँ देख सकते हैं: अधार पापस्थानक सूत्र