धर्मानुपालना के दस प्रकार in jainism
जैन धर्म में “धर्मानुपालना के दस प्रकार” से प्रायः दश‑धर्म / दश‑लक्षण ही समझे जाते हैं – यानी धर्म के वे दस मुख्य गुण, जिनका पालन (अनुपालन) करना है। ये हैं:
- उत्तम क्षमा (क्षमा धर्म)
– सब जीवों के प्रति क्षमा‑भाव रखना, द्वेष न रखना, किसी ने कष्ट दिया हो तो भी भीतर से उसे क्षमा करना।
- उत्तम मार्दव (मार्दव धर्म)
– नम्रता, विनम्रता; अहंकार, घमण्ड, “मैं ही बड़ा हूँ” – ऐसे भावों को छोड़ देना।
- उत्तम आर्जव (आर्जव धर्म)
– सीधापन और निष्कपटता; मन‑वचन‑काया से एक‑सा व्यवहार, कपट, चालाकी, धोखा न रखना।
- उत्तम शौच (शौच / संतोष धर्म)
– बाहरी और भीतरी शुद्धि; कम में संतोष, लालच न रखना, मन को लोभ‑मोह से साफ करना।
- उत्तम सत्य (सत्य धर्म)
– जहाँ तक हो सके, हितकारी सत्य बोलना; झूठ, चुगली, कठोर वचन से बचना।
- उत्तम संयम (संयम धर्म)
– इन्द्रियों व मन का नियंत्रण; खाने, बोलने, देखने, सुनने – सबमें मर्यादा रखना, नियम में रहना।
- उत्तम तप (तप धर्म)
– शरीर और मन को पवित्र करने वाले व्रत, उपवास, स्वाध्याय, सहन‑शीलता, कष्ट सहकर भी धर्म में लगे रहना।
- उत्तम त्याग (त्याग धर्म)
– आसक्ति, अत्यधिक भोग‑विलास, संग्रह आदि का त्याग; आवश्यकता भर पर संतोष करना। (इस पर विस्तार से आप यहाँ भी पढ़ सकते हैं: )
- उत्तम आकिंचन्य (अकिंचन्य / अपरिग्रह धर्म)
– “कुछ भी मेरा नहीं” यह भावना; धन, वस्तु, मान‑प्रतिष्ठा, अपने‑पराये – इन सब में मोह कम करना, निर्लिप्त होना।
- उत्तम ब्रह्मचर्य (ब्रह्मचर्य धर्म)
– इन्द्रिय‑निग्रह, विषय‑विकारों से दूरी, पवित्र विचार और आचरण; मन‑वचन‑काया से शुद्धता रखना।
परम्परा के अनुसार
- दिगम्बर परम्परा में इन्हीं को दश‑लक्षण धर्म कहा जाता है और दशलक्षण पर्व के रूप में दस दिन तक एक‑एक धर्म का विशेष पालन व चिंतन किया जाता है।
- श्वेताम्बर परम्परा में भी ये दस गुण धर्म के मुख्य सद्गुण माने जाते हैं, भले पर्व का क्रम/नाम अलग हो।
यही दस गुण “धर्मानुपालना के दस प्रकार” हैं – यानी धर्म को अमल में लाने के दस मुख्य तरीके या रूप।